सलीका – शायर भट्टी

थोरी देर खड़े हुए थे *छाँव* में ।
आ गऐ है सभ की हम *निगाहों* में।

एक बार उसने गले लगाया था,
सारा जहाँ सिमट गया था *बाँहो* में।

युं ही नहीं संभल के चलना आया मुझे,
फूल नहीं काँटे थे मेरी *राहों* में।

लुप्त हुई है नस्लें कई परिंदों की,
इन्सानों ने ही घोला ज़हर *फिज़ाओं* में।

निकाल घर से दूआऐं देने वालोें को,
ढूंढ रहे हैं जिंदगी अब *दवाओं* में।

शहर में आ कर भी मैं परेशान नहीं हुआ,
सलीका जीने का सीखा हुआ है *गाँवों* में।

समुद्री तुफान भी मेरा कुछ बिगाड़ ना सके,
भट्टी माँ का नाम लिखा था मेने *नाव* में।

*शायर भट्टी*

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