मुक्तक – दिनेश अवस्थी फर्रुखाबाद।

जीवन है एक संग्राम पीछे पग न धारिये।
बढ़ते रहो अविराम अपना मन न मारिये।
हर पल विजय की आशा और विश्वास को लिए,
भजिए हरी का नाम सारे दुःख बिसारिये।
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मत दीन वचन औरों के सम्मुख न बोलिए।
राज दिल का भी प्यारे अपना न खोलिए।
सुनकर हंसेंगे लोग बांटेंगे न इंच भर,
वाणी की गरिमा प्यारे तुम स्वयंमेव तोलिए।
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जीवन को सरसता में जियें तो सही रहे।
अपमान का न घूंट पियें तो सही रहे।
बाकी तो ठीक ठाक रहेगा ये तुम जानो,
हृदय में जलें प्रेम दिये तो सही रहे।

दिनेश अवस्थी फर्रुखाबाद।

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