हिन्दी कविता-आबरू लूटने लगे

अब सरे राह नारी नर भक्षी घूमने लगे |
अकेली अबला आबरू निर्भय लूटने लगे |
सुना था जंगलो मे जानवर हिंसक रहते है |
लूट आबरूअबला बोटियाँ काटने लगे |
राह अकेली औरत बचाने कोई आता नहीं |
मर्द मर्दानीगिनी दिखाने कोई आता नहीं |
जब बहू बेटियाँ समाज मे सुरक्षित नहीं |
पड़ जाये मुसीबत नारियां रक्षित नहीं |
देख दुर्दसा माँ बहनो छाती फटने लगे |
राजनीति कुर्सी हथियाने हथियार हो गई |
तोल मोल खरीद फ़रोक्त ब्यापार हो गई |
कहा सो गए नारिया बिच राह कटने लगे |
कितना दर्दनाक शर्मनाक मंजर रहा होगा |
लूटती तड़पती प्रियंका दिल सिहर रहा होगा |
अब भगवान भरोसे जानो अस्मत बचने लगे |

श्याम कुँवर भारती

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