आदमी इंसान बन जाए

बक्श तौफीक सब को खुदा आदमी इन्सान बन जाये
मोहब्बत लगा ले गले नफरत से अन्जान बन जाये ,

इल्तजा भी बस इतनी आदमी को इन्सान बनाने की
मैंने ये तो नहीं कहा था आदमी शैतान बन जाये ,

जज्बा इन्सानियत का हर इन्सान में भर दे अल्लाह
फिर कुछ फर्क नहीं कि वो हिन्दु या मुसलमान बन जाये ,

ये खबर किसी को हो न हो लेकिन मुझे खबर है सब
तेरी इनायत की नजर से सहरा गुलिस्तान बन जाये ,

न आबो-दाना , न आशियाना जिस वतन की आवाम पास
किस काम का लीडर , चाहे वतन का सुल्तान बन जाये ,

बनाये रखना हाथ अपना सर पे ‘राकेश’ के ऐ खुदा
ऐसा न हो बेच कर जमीर वो बेईमान बन जाये ,

राकेश कुमार मिश्रा

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