अंतर मन की प्यास

सारे उपक्रम धरे रह गए
टूटी मन की आस
सूख गया अंतर हृदय
बुझी न मन की प्यास ।

तृष्णा तेरे त्रास तंत्र का
कहां कोई प्रतिकार
तू जिसके उर बस गया
उसका उप संहार
अक्सर सहता है वहीं
जीवन में उपहास
सूख गया अंतर हृदय
बुझी न मन की प्यास ।

नित नित करता है सखा
खुद से ही षडयंत्र
मर्यादाएं तोड़ रहा नित
इतना हुआ स्वतंत्र
कौन भंवर मे फंस रहा
कहां उसे आभास
सूख गया अंतर हृदय
बुझी न मन की प्यास ।

प्रत्यक्षम् परिणाम पर
करता कहां विचार
धर्म त्याग कर आतुर है
करने को व्यापार
अंधकार की आदत डाले
ढूंढ़े बुद्धि प्रभास
सूख गया अंतर हृदय
बुझी न मन की प्यास ।

विजय कल्याणी तिवारी
बिलासपुर छग

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