हसरतों की राख

मेरी जिंदगी के अनोखे नजारे
कभी सुख कभी दुःख के भंडारे
हसरतों की राख कहाँ वदारे।

शोले शबनम की हस्तियों में
उगलते है नफरत के अंगारे
हसरतों की राख कहाँ वदारे।

रह गए सूत्रबन्धन के बिन ये
अपनी जिंदगी के बच्चे यूँ कंवारे
हसरतों की राख के ये बेचारे।

मोहब्बत का पैमाना इस कदर
चाहतों की दुनियां में ये न जीते
हसरतों की राख के ये हारे।

चलायमान गगन के मन मन्दिर में
आशाओं की बरसती है फुहारें
हसरतों की राख कहां वदारे।

प्रवीण शर्मा ताल

One comment

  • आपकी लिखी रचना “सांध्य दैनिक मुखरित मौन में” आज मंगलवार 19 नवम्बर 2019 को साझा की गई है……… “सांध्य दैनिक मुखरित मौन में” पर आप भी आइएगा….धन्यवाद!

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