खुली हव मे सांस ले सकें – विजय कल्याणी तिवारी

दुषित हवाओं से मुक्ति हो
खुली हवा में सांस ले सकें
कौन यहां अवतारी होगा
जिससे थोड़ी आस ले सकें ।

बिखरे बिखरे माला मोती
छिन्न भिन्न होती आशाएं
विश्वासों का रिश्ता टूटा
सघन सबल अंतस शंकाएं ।

प्रेम और करूंणा के बदले
कुंठा कटुता शेष बचा है
सारा उजला पन परिवर्तित
अंतस कालिख बसा रचा है ।

अपनों ने अपनों को लूटा
मन: भेद भी खूब बढ़े हैं
जिन पर रहा अटूट भरोसा
नित्य छद्म वे लोग गढ़े हैं ।

परिवर्तन के इस प्रभाव ने
सब कुछ उलट पुलट कर डाला
छुप छुप कर वे शहद चाटते
शेष कंठ में उतरे हाला ।

सत्य प्रताड़ित झूठ पुष्ट है
धर्म कर्म है बात पुरानी
बहुत सबल हो गई धूर्तता
गढ़ी जा रही अलग कहानी ।

जाने मौसम कब बदलेगा
कब परिवर्तन आ पाएगा
लगता है कि समय की आंधी
बहुत दूर तक जाएगा ।

आशा वादी सोचों का क्या
वे टक टकी लगाए हैं
कभी तो उनका रूख बदलेगा
जो बरजोर हवाएं हैं ।

सोच सघन परिवर्तन मांगे
प्रात जाग की मांग करे
आर्तनाद की अद्भुत पीड़ा
जाने कब कैसे कौन हरे ।

लगता है खुद के उपक्रम का
केवल पथ ही शेष बचा है
शायद ईश्वर का हम सबको
यहीं परम अनुदेश बचा है ।

शायद साहस कर उठ जाना
परिवर्तन का उपक्रम लाए
अंधकार का शमन करे और
समता का सूरज उग आए ।

भेद मिटे मन मिले सहज ही
परिवर्तन का चक्र चले
जहां जहां हो घना अंधेरा
वहां वहां पर दीप जले ।

विजय कल्याणी तिवारी
बिलासपुर छग-आभिव्यक्ति-592

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