पथ निशान का – BY त्रिपुरेन्द्र ओझा " निशान"

जुड़ते -टूटते धागों ने ,
जलते बुझते आगों ने ,
बनते बिगड़ते रागों ने ,
समाज के विषधर नागों ने
पद-निशान को किसने मोड़ दिया
पथ ” निशान ” का किसने मोड़ दिया ||१

पकड़ते छूटते हाथों ने
मिलते बिछड़ते साथों ने
बनती बिगडती बातों ने
मुंह मांगी सौगातों ने
पद-निशान को किसने मोड़ दिया
पथ ” निशान ” का किसने मोड़ दिया ||२

अकेली तनहा रातों ने
कुछ शेष बचे हुए नातों ने
कुछ अपनों की घातों ने
कुछ गैरों के साथों ने
निज – मान को किसने तोड़ दिया

पथ ” निशान ” का किसने मोड़ दिया ||३

कुछ टेढ़ी मेढ़ी राहों ने
कुछ बिन मांगी चाहों ने
किये अनगिनत गुनाहों ने
कुछ अपनों की सलाहों ने
पद-निशान को किसने मोड़ दिया
पथ ” निशान ” का किसने मोड़ दिया ||४

सुर्ख लाल लरजते होठों ने
उल्फत में मिले मुफ्त चोटों ने
दृग नीर बहाते सोतों ने 

निज – मान को किसने तोड़ दिया

पथ ” निशान ” का किसने मोड़ दिया ||५

नये समाज कि रीतों ने
कृत प्राण विहीन ,प्रण-जीतों ने
कुछ सुदूर देश के मीतों ने
कुछ भूली बिसरी गीतों ने
रुख निशान का किसने मोड़ दिया 

पथ ” निशान ” का किसने मोड़ दिया ||६

सौन्दर्य विष के प्यालों ने
कम्पित होठों के हालों ने
घनघोर घने लट जालों ने
तरसते गुजरते सालों ने
निज – मान को किसने तोड़ दिया

पथ ” निशान ” का किसने मोड़ दिया ||७

– त्रिपुरेन्द्र ओझा ” निशान “

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