Monthly Archives: November 2017

VMW Team – झांसी की रानी लक्ष्मीबाई

रानी लक्ष्मीबाई ने अपने अद्भुत शौर्य और पराक्रम से न सिर्फ अंग्रेजों को नतमस्तक किया बल्कि पूरे विश्व मे भारतीय वसुंधरा को गौरवान्वित किया। रानी लक्ष्मीबाई ने भारतीय इतिहास में वीरता और स्वाभिमान का ऐसा अध्याय जोड़ा है जो सदियों तक देशवासियों को प्रेरित करता रहेगा। ‘मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी’ अदम्य साहस के साथ बोला गया यह वाक्य बचपन से लेकर अब तक हमारे साथ है . रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर, 1828 को बनारस के एक मराठी ब्राह्मण परिवार में हुआ. उन्हें मणिकर्णिका नाम दिया गया और घर में मनु कहकर बुलाया गया. 4 बरस की थीं, जब मां गुजर गईं. पिता मोरोपंत तांबे बिठूर जिले के पेशवा के यहां काम करते थे और पेशवा ने उन्हें अपनी बेटी की तरह पाला. प्यार से नाम दिया छबीली . मणिकर्णिका का ब्याह झांसी के महाराजा राजा गंगाधर राव नेवलकर से हुआ और देवी लक्ष्मी पर उनका नाम लक्ष्मीबाई पड़ा. बेटे को जन्म दिया, लेकिन 4 माह का होते ही उसका निधन हो गया. राजा गंगाधर ने अपने चचेरे भाई का बच्चा गोद लिया और उसे दामोदार राव नाम दिया गया. ग्वालियर के फूल बाग इलाके में मौजूद उनकी समाधि आज भी मर्दानी की कहानी बयां कर रही है. हम सभी ने लक्ष्मीबाई की कहानी सुनी है, लेकिन सुभद्राकुमारी चौहान ने अपनी कलम के जरिए उनकी जो बहादुरी हमारे सामने रखी, उसकी मिसाल दूसरी कोई नहीं.

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,

बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी, 

गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, 

दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी। 


चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥ 


कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी, 

लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी, 

नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी, 

बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।


वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार, 

देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार, 

नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार, 

सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़। 


महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥ 


हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में, 

ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में, 

राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में, 

सुघट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आयी थी झांसी में।


चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव को मिली भवानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई, 

किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई, 

तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई, 

रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।


निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया, 

राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया, 

फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया, 

लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया। 


अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥ 


अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया, 

व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया, 

डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया, 

राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया। 


रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥ 


छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात, 

कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात, 

उदैपुर, तंजौर, सतारा,कर्नाटक की कौन बिसात? 

जब कि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात। 


बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


रानी रोयीं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार, 

उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार, 

सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार, 

‘नागपुर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार’। 


यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान, 

वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान, 

नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान, 

बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान। 


हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी, 

यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी, 

झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी, 

मेरठ, कानपुर,पटना ने भारी धूम मचाई थी, 


जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम, 

नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम, 

अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम, 

भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम। 


लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में, 

जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में, 

लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में, 

रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वंद असमानों में। 


ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार, 

घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार, 

यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार, 

विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार। 


अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी, 

अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी, 

काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी, 

युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी। 


पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार, 

किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार, 

घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार, 

रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार। 


घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी, 

मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी, 

अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी, 

हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी, 


दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी, 

यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी, 

होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी, 

हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी। 


तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

पद्मिनी ..और बॉलीवुड -By TRIPURENDRA OJHA

सभी पाठकों को नमस्कार !
मै त्रिपुरेन्द्र ओझा आपके लिए एक ब्लॉग लेकर आया हूँ , वैसे तो इसे आप इसे ब्लॉग न मान कर एक आवाज, एक चीख मानिये जो शब्दों के माध्यम से आप सब तक पहुँचाना चाहता हूँ |
वैसे भी जब कई मुद्दे बहुत ही परेशान कर देते हैं तो मैं बैठ जाता हूँ लिखने जो आज कल दौडभाग भरी जिन्दगी में दिन ब दिन मुश्किल होता जा रहा है |
आइये मुद्दे पर आते है ,आज कल पद्मिनी पर बहुत शोर मचा हुआ है , पूरे देश भर में तमाम हिन्दू संगठन इस मुद्दे पर बवाल काट रहे हैं और तो और करनी सेना नाम के संगठन ने तो दीपिका पादुकोण कि नाक तक काटने कि धमकी दे डाली है |
वैसे भी ये पहला मामला नही है जब हिन्दू भावनाएं आहत करने का आरोप फिल्म उद्योग पर लग रहा है , इसके पहले भी कई बार बवाल कट चुकें है चाहे वो pk हो, जोधा अकबर, सेक्सी राधा, या फिर गोलियों कि रासलीला राम लीला ! बात ये है कि क्यों  आखिर ऐसा हो क्यों रहा ? उत्तर बड़ा ही कड़वा है और आसान है | इसका जिम्मेदार हिन्दू समाज खुद है जो अपने धर्म का खुद सम्मान नही करता | धर्म संस्कार और संस्कृति आज कल के पढ़े लिखे लोगों के लिए आडम्बर मात्र बन कर रह गया है , लोग खुद कृष्ण , हनुमान, द्रौपदी पर दूसरे समुदाय द्वारा बनाये गये जोक्स को पढ़कर हँसतें है और एक दूसरे को भेजतें हैं | ये जानने के बाद भी कि इस फिल्म में देवी देवताओं का मजाक बनाया जा रहा है लोग जम कर देखते हैं और फिल्म को ब्लॉकबस्टर करवा देते है जिससे फिल्म निर्माताओं का हौसला और बढ़ता है, उन्हें धर्म , संस्कृति और संस्कारों से कोई सरोकार नही होता उन्हें केवल अपनी दुकान चलानी होती है | ये हाई सोसाइटी के बेवकूफ,ड्रग्स और शराब सिगरेट के नशे में उल्टियाँ करने वाले हॉलीवुड की  नग्नता , मारपीट , एक्शन और गाली गलौच को चुरा कर हमारे युवा पीढ़ी को बर्बाद तो कर सकते हैं मगर इनकी इतनी औकात नही कि ये intersteller, lucy, gravity, shutter आइलैंड जैसी साइंस फिक्शन फ़िल्में बना कर युवाओ को विज्ञान जानने पर मजबूर करें अपितु ये केवल आइटम songs , सनी लीओन को ही बेच कर अपनी जेब भर सकते हैं |

कहते हैं कि अगर कोई बड़ा वृक्ष को सुखाना हो तो उसके जड़ में रोज विषैली चीजे डालते जाओ वो एक न एक दिन पूरी तरह से मर जायेगा ठीक वैसे ही हिन्दू संस्कृति को मारने के लिए षड़यंत्र किस कदर किये जा रहे हैं कि उसके पाठ्यक्रमों में उलटी सीधी चीजें वामपंथी प्रोफेसरों द्वारा डाल दी जातीं हैं जैसे BA पास  कोर्स में दिल्ली यूनिवर्सिटी में  AK रामानुजन का आर्टिकल 300 RAMAYANAS पढाया जा रहा था, जिसमें फ्रीडम of स्पीच के नाम पर उलटी सीधी चीजें, जैसे 300 प्रकार के रामायण हैं , सीता रावन के छींक से पैदा हुईं और लक्षमण और सीता में अनैतिक सम्बन्ध थे और भी उलटी सीधी चीजें आदि गलत और शर्मनाक तथ्यों को घुसेड कर हिन्दू धर्म को गलत दिशा में ले जाने और संस्कृति को जड़ से मिटाने के कुत्सित प्रयास हुए थे   जिसे काफी लड़ाइयाँ लड़ कर ३ साल बाद इस कोर्स को हटवाया गया | बॉलीवुड में pk जैसीं फ़िल्में बना कर ब्रेनवाश किया जाता है बच्चों का ताकि वो अपने धर्म से विमुख होकर अपनी संस्कृति कि धज्जियाँ उड़ा सकें और वर्षों पुरानी हमारी सभ्यता और संस्कृति का सफाया हो सके |

ये बात हिन्दू समाज के लोगों को खुद समझना होगा कि बॉलीवुड में गुलशन कुमार जैसे लोगों कि हत्या क्यों हो जाती है जिसके आरती के अल्बम आज भी सुबह सुबह हमारे घरों में बजते हैं , कुमार शानू , सोनू निगम , उदित नारायण, शान , सुखविन्दर जैसे लोगों को अचानक काम मिलना बंद क्यों हो जाता है , अरिजीत सिंह जैसे शानदार नव गायकों का मनोबल तोड़ने की कोशिश की जाती है और चीख चीख कर गाने वालों को पकिस्तान से बुला कर सर आँखों पर बिठाया जाता है ,
जय माँ वैष्णो देवी , माँ संतोषी जैसी और तमाम धार्मिक फिल्मों कि लगातार सफलताओं के बाद क्यों गुलशन कुमार को मारकर नदीम जैसे लोग अरब भाग जाते हैं , उसके बाद खानों का दबदबा कैसे बढ़ जाता है कैसे पाकिस्तान से एक्टर और एक्ट्रेस और सिंगर्स को बुलाया जाता है, एक के बाद एक हिन्दू आपत्तिजनक फिल्मों और शब्दों  का प्रचलन बढ़ जाता है , सेक्सी राधा और सेक्सी दुर्गा, रासलीला जैसे शब्दों से हिन्दू भावनाओं पर कुठाराघात होता है  , अगर आप अब भी ये न समझे कि बॉलीवुड अंडरवर्ल्ड ,आतंकियों, और विदेशी ताकतों के इशारों पर चल रहा है तो आप बेवकूफ हैं  |

बात केवल पद्मिनी फिल्म की नही है बल्कि बात हिन्दू धर्म के ऊपर उठ रही उन षड्यंत्री कुठारों की है जिन्हें अगर हमने आज छद्म धर्मनिरपेक्षतावाद का चोला ओढ़ कर नजरंदाज किया तो आने वाली पीढ़ी गर्त में डूब जाएगी , करवा चौथ , जलीकट्टू , दही हांड़ी , संक्रांति , होली , दीपावली आदि हर त्यौहारों के आते ही रंडी रोना मच जाता है | मै पूछता हूँ कि एनिमल क्रुएलिटी तुम्हे केवल जल्लीकट्टू पर ही क्यों दिखता है जब विशाल विशाल गाय और ऊँट जैसे जानवरों को धर्म के नाम पर काट देते हो तब क्यों नही दिखता ?     प्रदूषण केवल दीपावली पर ही क्यों दिखता है  २५ दिसम्बर से १ जनवरी तक क्यों नहीं दिखता? ऐसे ही फिल्मे मरियम और मोहम्मद साहब, कर्बला की लड़ाई पर क्यों नही बनती? बननी चाहिए लेकिन तुम्हे पता तुम्हारे फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन का दंश केवल हिन्दू समाज ही बर्दाश्त कर सकता है बाकियों से तुम्हारी फटती है |

सबसे गंभीर बात ये है कि जब बात हिन्दू धर्म और संस्कृति की आती है तो  हमारा दलित समाज हमसे ही प्रश्न पूछने लगता है, हम कहते है उनसे प्रश्न नही पूछते कि क्यों अंबेडकर साहब ने इस्लाम ग्रहण नही किया आखिर क्यों ?
जैसे फूलन देवी पर मजा आया पद्मिनी पर रो क्यों रहे हो ? फूलन देवी पर फिल्म बनी तो खुद फूलन देवी ने बनवाई, उनकी सहमति बल्कि फिल्म की  रॉयल्टी भी उन्होने लिया , फिल्म के दृश्य पर भी न तो उन्होंने, न ही दलित समाज ने कोई आपत्ति की लेकिन तुम फूलन देवी को मोहरा बना कर हिन्दू समाज को मत बांटो, उस आवाज को मत कमजोर करो जो अब बुलंद हो रही है कि ये हिन्दुस्तान इस प्रकार के घटियापन को आपके नौटंकी द्वारा नहीं स्वीकार करेगा | जो अभिनेत्रियाँ नग्न होकर , देह प्रदर्शन करती घूमती है वो इसकी अधिकारी नहीं कि महा सती पद्मिनी का किरदार धारण भी कर सके , सच ही कहा किसी ने जो रोज बदलती शौहर वो जौहर क्या जाने ?याद करो कि राम और सीता किरदार निभाने  की वजह से अरुण गोविल और दीपिका घर घर में पूजे जाने लगे थे , क्योंकि उन्होंने उस किरदार के साथ न्याय किया और लेकिन आज वाली दीपिका और आज का निर्माता भंसाली  कहीं से भी पद्मिनी के किरदार के साथ न्याय नही करते,बल्कि उसे प्रेम प्रसंग और अश्लील मसाले के साथ परोसने का काम कर रहे हैं बिना ये सोचे कि जो चीज हिंदुस्तान का गौरव है , शान है उसको धूमिल करना उचित नहीं |

आखिर कब तक , कब तक सहेगा केवल एक समाज इस प्रकार के भावनाओं के साथ खिलवाड़ , क्या यही मंशा है तुम्हारी कि इतनी अति कर दो कि हिन्दू समाज का युवा भी आजिज होकर भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने वालों की गर्दन उड़ा दे , गोली मार दे और तुम ये कह सको कि आतंकवादी हिन्दू भी है , ताकि तोड़ सको ये मिथक कि शांति और अहिंसा का का जिम्मा केवल हिन्दुवों की है , कह सको कि तुम्हारी नीचता में हिन्दुवों ने भी बराबरी कर ली ? यही चाहते हो कि इस प्रकार के तुम्हारे फ्रीडम ऑफ़ स्पीच और फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन के कारण हिन्दू समाज भी आतंक की भाषा बोलने लगे ? क्यों ले रहे धैर्य की परीक्षा ताकि ये तुम मजबूती से कह सको कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता ?
मत करो ये सब ! तुम्हारी स्वतंत्रता केवल वहीँ तक है जहाँ तक किसी की नाक नहीं आती ,रहने दो शांति से , मत करो हमारे उन इतिहासों के साथ छेड़छाड़ जिनकी वजह से आज हम खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं , मत करो प्रताड़ित अपने स्वतंत्रता के नाम पर उस समाज को जिसका आधार हिन्दुस्तान है , मत करो षड्यंत्र हमारे बच्चों के साथ जो पद्मावत को इस नाच के रूप में जानें , मत कुरेदो  हमारे जख्म फिर से पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर चंद पैसों के लिए, मत भटकाओ हमारी आने वाली पीढ़ी को , मत करो हमें हमारे धर्म के विमुख या फिर मत बनाओ हमें धर्म के प्रति इतना कट्टर  |
मत तैयार करो कोई और गोडसे …………..|

                                                                                        त्रिपुरेन्द्र कुमार ओझा  ‘निशान’

Hardik Patel Leak MMS – Gujrat Election

पाटीदार आरक्षण आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल की एक और कथित सीडी सामने आई है। दावा किया जा रहा है कि वीडियो में हार्दिक और उनके दो साथी एक लड़की के साथ आपत्तिजनक स्थिति में हैं। हार्दिक ने ट्वीट में लिखा, बीजेपी ने मेरी निजी जिंदगी पर हमला किया है। बीजेपी में भी कई लोग हैं और मैं उनकी सेक्स सीडी भी लेकर आऊंगा। हार्दिक बड़ा हो गया है। करोड़ों रुपये मेरी छवि खराब करने के लिए खर्च किए जा रहे हैं। गंदी राजनीति शुरू चुकी है। हार्दिक ने लिखा, मुझे इससे फर्क नहीं पड़ता, लेकिन गुजरात की महिलाओं का अपमान किया जा रहा है। हार्दिक ने यह भी कहा कि वीडियो क्लिप्स से पाटीदार आंदोलन पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

चुंबक की तरह पैसे को खींचता है येे पौधा


वैसे तो पैसा कमाना इतना आसान नहीं है, किन्तु हर किसी की ख्वाहिश होती है कि उसके पास अपार धन-दौलत हो। कमाने के लिए जी तोड़ मेहनत करनी पड़ती है, लेकिन कई बार बहुत मेहनत करने पर भी उम्मीद के अनुसार पैसा नही आता। इसलिए लोग घर में वास्तु और ज्योतिष के उपाय करते हैं।
मनी प्‍लांट काफी प्रचलित है और ज्‍यादातर घरों में आपको मिल भी जाएगा। मगर क्‍या आपने कभी ‘क्रासुला’ का नाम सुना है? इसे भी मनी ट्री कहा जाता है। 
कहते हैं यह पौधा चुंबक की तरह पैसों को अपनी ओर खींचता है। यह छोटा सा मखमली पौधा गहरे हरे रंग का होता है। इसकी पत्तियां चौड़ी होती हैं और यह फैलावदार होता है, घास की तरह।इसे लगाने में ज्यादा मेहनत नहीं लगती। इसका पौधा खरीद के किसी गमले या जमीन में लगा दें, फिर यह अपने आप फैलता रहेगा। इसे धूप या छांव कहीं भी लगाया जा सकता है। इस पौधे के बारे में मान्यता है कि यह सकारात्मक ऊर्जा और धन को अपनी ओर खींचता है। अब जहां तक देखभाल की बात है तो मनी प्‍लांट की तरह इस पौधे के लिए ज्‍यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है। अगर आप दो-तीन दिन बाद भी इसे पानी देंगे तो यह सूखेगा नहीं। क्रासुला घर के भीतर छांव में भी पनप सकता है। यह पौधा अधिक जगह भी नहीं लेता। आप इसे छोटे से गमले में भी लगा सकते हैं। क्रासुला अच्छी-ऊर्जा की तरह धन को भी घर की ओर खींचता है। इस पौधे को घर के प्रवेश द्वार के पास ही लगाएं। जहां से प्रवेश द्वार खुलता है, उसके दाहिनी ओर इसे रखें। कुछ ही दिनों में यह पौधा अपना असर दिखाना शुरू कर देगा। घर में हर तरह की सुख-शांति भी बरकरार रहेगी।
एम के पाण्डेय निल्को

VMW Team – राजस्थान प्रतिभा सम्मान समारोह 2017

रवीन्द्र कला मंच और वीएमडबल्यू टीम के तत्वावधान में राज्य स्तरीय प्रतिभा सम्मान समारोह आयोजन गुलाबी नगरी में 26 दिसंबर को आयोजित होगा। समिति के संयोजक एम के पाण्डेय निल्को ने बताया कि सम्मान समारोह के लिए 10 अक्टूबर से 15 नवंबर तक आवेदन पत्र भरे जाएगें। प्रतिभा सम्मान हेतु शिक्षा, समाज सेवा, विज्ञान, पत्रकारिता और खेल के क्षेत्र से आवेदन आमंत्रित है । अधिक जानकारी के लिए आप +91-9024589902 पर संपर्क कर सकते है ।

ट्रैफिक सिग्नल पर भारत के कर्णधार

एक लावारिश बिना मां-बाप का बच्चा क्या खुद ही भिखारी बनने का फैसला कर लेता है? बिना किसी छत के भूखे पेट खुले आसमान के नीचे गुजारने वालों की तकदीर में जिल्लत और तिरस्कार के सिवा और क्या होता है तिस पर हमारी मरी हुई संवेदनाओं से निकले लफ़्ज जब उन्हें नसीहत देते हैं तो शायद एक बार उन्हें बनाने वाले भगवान भी कह उठते होंगे “वाह रे इंसान” – Tamanna

भिक्षावृत्ति एक अपराध, यह वे पंक्तियां हैं जो कभी पोस्टरों तो कभी विज्ञापनों द्वारा अकसर दिखाई दे जाती हैं, इन पंक्तियों को पढ़कर हम भिखारियों को घृणा की दृष्टि से देखने लगते हैं, लेकिन क्या हमने कभी यह सोचा है कि हमारी घृणा का वास्तविक हकदार आखिर है कौन, वो जो अपनी भूख मिटाने के लिए 1-1 रुपए के लिए लोगों के सामने हाथ फैलाते हैं, धूप, बारिश, तूफान हर मौसम में आसमान को ही अपनी छत समझकर रहते हैं, कूड़े के ढेर से खाने का सामान एकत्रित कर खाते हैं या फिर वो लोग जो इनकी ऐसी हालत के लिए जिम्मेदार हैं? विकसित देशों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा भारत देश आज एक अहम समस्या समस्या का शिकार बना हुआ है। हालांकि सांस्कृतिक देश भारत में यह कोई नई बात नहीं है। इतिहास के पन्नों को उलटकर देखें तो पता चलेगा कि पहले भी हमारे देश में ‘भिक्षावृत्ति होती थी। सांसारिक मोह-माया त्यागकर ज्ञान प्राप्ति के लिए निकले महापुरुष भिक्षा मांगकर अपना जीवन-यापन करते थे। उनका उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ ज्ञान प्राप्ति होता था। तत्कालीन समाज में भिक्षावृत्ति को सामाजिक बुराई नहीं मानी जाती थी। बल्कि भिक्षुओं का आदर-सत्कार किया जाता था।दूसरी ओर समय के साथ-साथ हर ची बदल गई। देश विकास की राह में बढ़ा, इसके साथ ही बाजारवाद को बढ़ावा मिला, लेकिन साथ ही बढ़ी भिखारियों की संख्या। हालांकि इसे रोकने के लिए काफी कोशिशें की गईं लेकिन यह महज जीवन-यापन का जरिया नहीं बल्कि एक नए कारोबार के रूप में समाज के सामने सीना तानकर खड़ा हो गया। 

इस सामाजिक कुरीति के बढऩे का सबसे बड़ा कारण अशिक्षा है। एक तरफ जहां सरकार सर्वशिक्षा अभियान के तहत सभी को शिक्षित करना चाहती है, तों महंगी होती शिक्षा से गरीब तबका कोसों दूर होता जा रहा है। ऐसे में यह तबका मजबूर हो जाता है कि जितना वक्त पढ़ाई में बर्बाद किया जाएगा, उतने वक्त में भविष्य के लिए भीख मांगकर अच्छी खासी रकम इकट्ठा की जा सकती है। भारत जैसे विकासशील देश में रोजगार के पर्याप्त साधन न होने के चलते इस पेशे को बढ़ावा मिलता है। यहां तक कि कभी-कभी ऐसे लोग भी दिख जाते हैं जो शिक्षित तो हैं पर उनके पास रोजगार नहीं है, थक-हार कर वो इस पेशें से जुडऩे में तनिक भी संकोच नहीं करते।
कुछ देर के लिए जिस जगह से गुजरने पर हम अपनी नाक रुमाल से ढक लेते हैं वहां यह लोग अपनी पूरी जिंदगी बिता देते हैं, लेकिन जब किसी को दोषी ठहराने की बात आती है तो हम इन्हें ही साफ-सुधरे शहर की गंदगी समझ लेते हैं. इनके जीवन को सुधारने के स्थान पर हम इनके जीवन को ही कोसते रहते हैं.
सरकार की नजर में भिक्षावृति एक अपराध है और भीख मांगने वाले लोग एक अपराधी, लेकिन हैरत की बात तो यह है कि इन अपराधियों के लिए तो जेलों में भी कोई जगह नहीं है. उन्हें यूं ही सड़कों पर सड-अने के लिए छोड़ दिया जाता है. भिक्षावृत्ति को आपराधिक दर्जा देने के अलावा हमारी सरकार ने कभी उनकी ओर, उनके जीवन में व्याप्त मर्म की ओर ना तो कभी ध्यान दिया और ना ही उनके लिए किसी भी प्रकार की कोई योजना बनाई. सरकार ही क्यों हम अपनी ही बात कर लेते हैं, समाजिक व्यवस्था को ताने देने के अलावा हम करते भी क्या है. सड़क पर कोई भीख मांगता है तो हम उसे लेक्चर सुना देते हैं कि कुछ काम कर लो, लेकिन आप ही बताइए क्या कोई खुशी से अपने आत्म-सम्मान को किनारे रखकर कटोरा हाथ में उठाता है? हम उन्हें यह समझाते हैं कि कुछ काम करो भीख मांगना अच्छी बात नहीं है तो कुछ लोग ऐसे भी हैं जो उन्हें दुत्कार कर अपनी शान बढ़ाते हैं . समाज की गंदगी समझे जाने वाले यह भिखारी सड़क पर ही पैदा होते हैं, वहीं अपने रिश्ते बनाते हैं और कभी बीमारी से तो कभी भूख से वहीं मर जाते हैं. लेकिन इनकी ओर कभी कोई ध्यान नहीं दिया जाता है और भविष्य में भी ऐसी उम्मीद करना आसमान छूने जैसा ही है. बड़ी-बड़ी बातें करने वाले सरकारी नुमाइंदों के साथ-साथ शायद अन्य लोग भी जिन्हें आजकल हम समाज सुधारक कहते नहीं थक रहे उनके सामने भी जब कोई भिखारी भीख मांगने आता है तो वह उसे कभी पैसे देकर तो कभी दुत्कार कर अपनी गाड़ी के शीशे बंद कर लेते हैं. लेकिन शोहरत और संपन्नता से भरे अपने जीवन में वापस लौटने के बाद उन्हें कुछ याद नहीं रहता और बात फिर वहीं की वहीं रह जाती है कि भिक्षावृत्ति अपराध है और भीख मांगने वाले अपराधी . 

पथ निशान का – BY त्रिपुरेन्द्र ओझा " निशान"

जुड़ते -टूटते धागों ने ,
जलते बुझते आगों ने ,
बनते बिगड़ते रागों ने ,
समाज के विषधर नागों ने
पद-निशान को किसने मोड़ दिया
पथ ” निशान ” का किसने मोड़ दिया ||१

पकड़ते छूटते हाथों ने
मिलते बिछड़ते साथों ने
बनती बिगडती बातों ने
मुंह मांगी सौगातों ने
पद-निशान को किसने मोड़ दिया
पथ ” निशान ” का किसने मोड़ दिया ||२

अकेली तनहा रातों ने
कुछ शेष बचे हुए नातों ने
कुछ अपनों की घातों ने
कुछ गैरों के साथों ने
निज – मान को किसने तोड़ दिया

पथ ” निशान ” का किसने मोड़ दिया ||३

कुछ टेढ़ी मेढ़ी राहों ने
कुछ बिन मांगी चाहों ने
किये अनगिनत गुनाहों ने
कुछ अपनों की सलाहों ने
पद-निशान को किसने मोड़ दिया
पथ ” निशान ” का किसने मोड़ दिया ||४

सुर्ख लाल लरजते होठों ने
उल्फत में मिले मुफ्त चोटों ने
दृग नीर बहाते सोतों ने 

निज – मान को किसने तोड़ दिया

पथ ” निशान ” का किसने मोड़ दिया ||५

नये समाज कि रीतों ने
कृत प्राण विहीन ,प्रण-जीतों ने
कुछ सुदूर देश के मीतों ने
कुछ भूली बिसरी गीतों ने
रुख निशान का किसने मोड़ दिया 

पथ ” निशान ” का किसने मोड़ दिया ||६

सौन्दर्य विष के प्यालों ने
कम्पित होठों के हालों ने
घनघोर घने लट जालों ने
तरसते गुजरते सालों ने
निज – मान को किसने तोड़ दिया

पथ ” निशान ” का किसने मोड़ दिया ||७

– त्रिपुरेन्द्र ओझा ” निशान “

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