कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह "आग" की एक रचना

इन मीठे-मीठे पकवानों का किसको भोग लगाऊं मैं
मेरे प्रभुजी हैं सीमा पर फ़िर कैसे खुशी मनाऊँ मैं

दुश्मन की लंका जली नहीँ संहार अभी तक बाकी है
प्रत्यंचा के आघातों की टंकार अभी तक बाकी है

सीता सी भूमी गिलगित सिंध बलूचिस्तानी रोती है
अगणित लाशें अपने सीने पर निर्दोषों की ढोती है

जेहादी रावण करता अट्टाहास इधर विस्फोटों से
सेना अपनी घायल होती रहती है असुरी चोटों से

लगता है जैसे खंडित हों माता के धड़ से अंग-अंग
लंकेश कोशिशें करता माँ की पावनता हो भंग-भंग

लेकिन अंगद से वीर हमारे गिरि बनकर के अड़े रहे
बलिदान दिया है प्राणों का रक्षक बनकर के खड़े रहे

दुश्मन को धूल चटाने वाले वीर जितेंदर बलिदानी
वो नितिन चौबिया चम्बल वाला अल्हड़ सिंह स्वाभिमानी

गुरनाम वीर जैसे कितने ही जगमग होते बुझे दीप
सिंधू के रक्तिम जल में मोती वितरित करते रहे सीप

आओ हम सब मिलकर उनके नामों के दिये जलाएंगे
जिस घर में अंधियारा हो उसको जगमग करने जाएँगे

उन असहाय माताओं के दिल में उम्मीद जगाएगे
उन रोते बच्चों के मुख पर मुस्कानें वापस लाएंगे

जिस दिन पावन माटी दुश्मन से करके जंग छुड़ाएगे
हाँ उसी दिवस को दीवाली जैसा उल्लास मनाएंगे

लेकिन इतना भी याद रहे पन्ना फ़िर दर-दर ना भटके
जो किया उसी ने दीपदान वो उसके दिल में ना खटके

जिसके सुत प्राणों को न्यौछावर करने वाले सेवक हैं
उसको एहसास दिलायेंगे हम भी तो उसके दीपक हैं

ये देव कहे जिस-जिस घर से सरहद पर दीपक जाता है
उस घर में दिये जला देना उसमें भी भारत माता है

कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह “आग”
9675426080

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