नेता जी सुभाषचन्द्र बोस

नेताजी शब्द हमारी स्मृति में सुभाषचन्द्र बोस के साथ इस कदर जुडी चली आयी है कि और के साथ इसका जुडना अटपटा लगता है।कभी बचपन में ही उनकी एक किताब पढी थी-तरुण के स्वप्न।उसका एक वाक्य मेरी स्मृति का स्थायी हिस्सा बन गया-‘हमें गलतियां करने का अधिकार चाहिए’।नेताजी की यह बात मेरे बचपन के लिए बहुत राहत देने वाली साबित हुई ।हम एक संयुक्त परिवार में रहते थे।परिवार के मुखिया मेरे बाबा थे।बाबा स्वभावत: उदारमना व्यक्ति थे।बहुत पढे लिखे न थे लेकिन सहज बुद्धि के धनी और उद्यमी व्यक्ति थे।मेरे पिता को पढने लिखने के बाद भी जीवन में व्यावहारिक सफलता नहीं मिली थी और वे कुछ सधुआ से गये थे।घर के काम धाम और व्यवस्था से विशेष सरोकार नहीं था।एक कमरे में अपने को बन्द किए तरह तरह के मन्त्र और राम नाम जपते रहते।हम भाई बहन अपनी जरूरतों के लिए पूरी तरह बाबा पर आश्रित थे।हमारे घर में एक ऐसे सदस्य भी थे जो पढाई लिखाई छोडकर घर बैठ गये थे।गाँव के और उस जमाने के लिहाज से काफी दिनों तक शादी नहीं हुई थी।पता नहीं घर के काम में मन नही लगता था या करने की क्षमता नहीं थी सो उनके पास समय ही समय था।स्वभाव से गुस्सैल,ईर्ष्यालु और बेहद संकुचित दिल दिमाग के व्यक्ति ।उन्होंने घर में अपनी भूमिका हिन्दी फिल्मों के दरोगा की चुन ली थी।उनका एक मात्र काम हमारी गलतियां निकालना और इस बहाने हमारी पिटाई करना था।पिटाई भी ऐसे करते जैसे किसी चोर या कमजोर अपराधी की पिटाई दरोगा करता है।उनकी सतत निगरानी और छोटी छोटी बात पर कसाई की तरह पिटाई करने की आदत से हम आतंकित रहते।वे हमारे बचपन के अभियोजक,दण्डाधिकारी और सजा देने वाले सब बने हुए थे।हमारा शारीरिक मानसिक विकास अवरुद्ध हो गया था।हमारे लिए मुक्ति का कोई उपाय नहीं था ।ऐसे ही समय में मेरे हाथ यह किताब लगी थी।मुझे लगा कि तरुणाई को इतने कठोर और नृशंस बन्धन में रखना उसकी कल्पनाशीलता और रचनात्मकता का सत्यानाश करना है।धीरे धीरे सुभाष बाबू के इस वाक्य ने मेरी चेतना को बदलना शुरु किया।और मेरे भीतर बच्चों या किशोरों के लिए स्वाभाविक उन्मुक्तता की प्रबल चाह पैदा हुई।और हम अपने घर के स्वयंभू दारोगा से अत्याचार से अपने को मुक्त करा सके।
आगे चल कर यह भी महसूस हुआ कि इस तरह की स्वयंभू दरोगई ओढ लेने वाले लोग कहीं न कहीं बहुत गहरे कुण्ठित होते हैं,घर में हों या समाज में सृजन ,कल्पना और सौन्दर्य के शत्रु होते हैं।सुभाषचन्द्र बोस को याद करते हुए यह बात बहुत शिद्दत से महसूस होती है।

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