शिक्षा – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’


शिक्षा है सब काल कल्प-लतिका-सम न्यारी;

कामद, सरस महान, सुधा-सिंचित, अति प्यारी।

शिक्षा है वह धारा, बहा जिस पर रस-सोता;

शिक्षा है वह कला, कलित जिससे जग होता।

है शिक्षा सुरसरि-धार वह, जो करती है पूततम;

है शिक्षा वह रवि की किरण, जो हरती है हृदय-तम।

क्या ऐसी ही सुफलदायिनी है अब शिक्षा?

क्या अब वह है बनी नहीं भिक्षुक की भिक्षा?

क्या अब है वह नहीं दासता-बेड़ी कसती?

क्या न पतन के पाप-पंक में है वह फँसती?

क्या वह सोने के सदन को नहीं मिलाती धूल में?

क्या बनकर कीट नहीं बसी वह भारत-हित-फूल में?

प्रतिदिन शिक्षित युवक-वृंद हैं बढ़ते जाते;

पर उनमें हम कहाँ जाति-ममता हैं पाते?

उनमें सच्चा त्याग कहाँ पर हमें दिखाया?

देश-दशा अवलोक वदन किसका कुम्हलाया?

दिखलाकर सच्ची वेदना कौन कर सका चित द्रवित;

किसके गौरव से हो सकी भारतमाता गौरवित।

अपनी आँखें बंद नहीं मैंने कर ली हैं;

वे कंदीलें लखीं जो कि तम-मधय बली हैं।

वे माई के लाल नहीं मुझको भूले हैं।

सूखे सर में जो सरोज-जैसे फूले हैं।

कितनी आँखें हैं लगीं जिन पर आकुलता-सहित;

है जिनकी सुंदर सुरभि से सारा भारत सौरभित।

किंतु कहूँगा काम हुआ है अब तक जितना;

वह है किसी सरोवर की कुछ बूँदों-इतना।

जो शाला कल्पना-नयन-सामने खड़ी है;

अब तक तो उसकी केवल नींव ही पड़ी है।

अब तक उसका कल का कढ़ा लघुतम अंकुर ही पला;

हम हैं विलोकना चाहते जिस तरु को फूला-फला।

प्यारे छात्र समूह, देश के सच्चे संबल,

साहस के आधार, सफलता-लता-दिव्य-फल,

आप सबों ने की हैं सब शिक्षाएँ पूरी;

पाया वांछित ओक दूर कर सारी दूरी।

अब कर्म-क्षेत्र है सामने, कर्म करें, आगे बढ़ें;

कमनीय कीर्ति से कलित बन गौरव-गिरिवर पर चढ़ें।

है शिक्षा-उपयोग यही जीवन-व्रत पालें;

जहाँ तिमिर है, वहाँ ज्ञान का दीपक बालें।

तपी भूमि पर जलद-तुल्य शीतल जल बरसे;

पारस बन-बन लौहभूत मानस को परसें;

सब देश-प्रेमिकों की सुनें, जो सहना हो वह सहें;

उनके पथ में काँटे पड़े हृदय बिछा देते रहें।

प्रभो, हमारे युवक-वृंद निजता पहचानें;

शिक्षा के महनीय मंत्र की महिमा जानें।

साधन कर-कर सकल सिध्दि के साधन होवें;

जो धब्बे हैं लगे, धौर्य से उनको धोवें।

सब काल सफलताएँ मिलें, सारी बाधाएँ टलें;

वे अभिमत फल पाते रहें, चिर दिन तक फूलें-फलें।

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