Monthly Archives: February 2015

बहुत कठिन है पत्रकारिता की डगर, फिर भी निभाना होगा अपना दायित्व

राष्ट्रीय प्रेस परिषद जनपद महराजगंज की इकाई का प्रथम वार्षिक अधिवेशन मंगलवार को स्थानीय अंबेडकर पार्क में संपंन हुआ। इस दौरान वरिष्ठ कांग्रेस नेता और गोरखपुर के पूर्व सांसद हरिकेश बहादुर ने कहा कि पत्रकारिता की डगर कठिन है। उसमें अपने लिए कम किंतु देश और समाज के लिए अधिक करने की जरूरत होती है। मीडिया इस काम को बखूबी कर रही है। यही कारण है कि उसे तरह तरह के आलोचनाओं और कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन इन सब पर पत्रकारों को विजय पानी होगी। चाहे कितनी भी परेशानियों का सामना करना पडे़ अपने दायित्व को निभाना होगा। खुद को भले ही जलाना पडे़, लेकिन आम लोगों में अपने अधिकारों व कर्तव्यों के प्रति सजगता और जागरूकता की ज्योति जलानी पडे़गी।
कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर हुआ। इसके बाद तत्काल रक्तदान कार्यक्रम शुरू हुआ। मुख्य अतिथि चिकित्सक डा. सीपी सिंह ने रक्तदान किया। ब्लड निकालने का कार्य गोरखपुर मेडिकल कालेज से आई डा. मंजीता मिश्रा की नेतृत्व वाली टीम ने किया। इस दौरान तीन दर्जन से अधिक लोगों ने रक्तदान किया।
अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार नर्वदेश्वर पांडेय देहाती ने की। कार्यक्रम के दौरान संरक्षक केदार शरण मिश्र द्वारा मुख्य अतिथि के साथ आए इंका नेता सूर्यनाथ पांडेय तथा अन्य को अंग वस्त्र भेंट कर स्मृति चिन्ह प्रदान किया। कार्यक्रम का संचालन बसंतपुर इंटर कालेज के समाज शास्त्र के प्रवक्ता डा. कृष्ण कुमार ने किया। अंत में अध्यक्ष अमित कुमार तिवारी ने सभी के प्रति आभार ज्ञापित किया। इस दौरान बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।

VMW Team का होली मिलन समारोह सम्पन्न

आज के इस भागमभाग भरी जिन्दगी में किसी के पास भी समय नहीं है लेकिन पुछो की क्या करते है तो उनका जवाब यही होता है की – कुछ खास नहीं या कुछ भी तो नहीं । हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है एक साथ मिलना बड़ा मुश्किल हो गया है लेकिन तकनीक के इस समय मे हम हमेसा एक दूसरे से जुड़े रहते है । इस बार का होली मिलन समारोह फोन पर ही हुआ किन्तु मजेदार और रसदार था सभी लोग एक से बढ़ कर एक रगीली बाते अपनी पिचकारी से एक दूसरे पर छोड़ रहे थे और आश्चर्य की बात की कोई भी इसका बुरा नहीं मन रहा था क्योकि सबको पता है की माहौल तो फगुआ का है । इसी क्रम मे एम के पाण्डेय निल्को ने रची एक रंगभरी रचना, अब आप को ही बताना है की कितनी रंगी है और कितनी गुजियादार, मसालेदार है ये रचना………..

VMW Team का होली मिलन समारोह सम्पन्न
जिसमे से कुछ रंगभरी बाते हुई उत्पन्न
शुरुआत  की मुख्य आयोजक योगेश जी ने कुछ इस तरह
की सभी रंग गय , एक ही रंग में हमारी तरह
मुख्य अतिथि के रूप में हरिदयाल जी और रामसागर जी पधारे
और अपने रंगीन मिजाज से, हमको सुधारे
माइक मिला जब हमारे विजय भाई को
लेकिन छोड़ कर आए थे हमारी भौजाई को
सब लोगो ने किया इसका विरोध प्रदर्शन
दिलीप जी ने भी दिया भरपूर समर्थन
गोरखपुर से गजेन्द्र जी आए
होली की गुजिया भी लाए
साथ मे उनके देवेश हमारे
होली के वे गीत सुनाये
जब मौका मिला मधुलेश भाई को
मारा चौका और ले आए भौजाई को
होली पर कुछ रचना सुनाये
जो किसी को भी न सुहाए
इसी क्रम मे अभिषेक जी आए
क्या हाल सुनाए, क्या बात बताए
देव भूमि की हवा लगी है उनको
और ठण्ड लग रही है हम सबको
हिमाचल मे रहते ऋषिन्द्र जी
फगुआ मे बनाते सबको पगलेन्द्र जी
होली की उनकी बाते सुनकर
खड़े हो जाते सभी तनकर
त्रिपुरेन्द्र जी है आज कल अलवर
मचाते है अंदर ही ये खलबल
देसी इनका जो मिज़ाज रंगीला
कईयो का चेहरा हो जाता पीला
लाल गुलाल सिद्धार्थ जी  लाए
खुद को बाबू साहब कहलाए
बीच मे कूदना इनकी आदत
पर मिलता है इनको भी आदर
मोहक जी की मन मोहिनी सी छटा
मोहित कर गई, ऐसी हो गई घटा
गुल खिलाये ये जैसे गुलगुल्ले
और खिलाये हम सबको रसगुल्ले
आशुतोष हमारे लालू कहलाए
फागुन में किसी को भी भालू बनाए
साथ में इनके सुन्दर बाबू को लेकर
चल दिये रंग पिचकारी खरीदकर
नीलेश, सत्यम कम नहीं किसी ओर
रोज गढ़ते है ये मजेदार जोक
बात बात मे कहते है ये मर्द
सुनकर इनको होता है पेट दर्द
गिरिजेश बाबू का क्या कहना
सिद्धेश बाबा के साथ ही रहना
दोनों दक्ष है अपनी कक्षा में
पर आता नहीं कुछ इनके बक्से में
सर्वेश हमारे दबंग
होली मे मचाए हुड़दंग
निल्को ने किया पुनः अभिनन्दन
होली मनाए और ले आनन्दन
कुछ ऐसे मना मिलन समारोह
कोई नहीं यहा आरोह अवरोह
याद करेगी दुनिया हमको कुछ इस तरह
की इतिहास रचा जाता है जिस तरह
होली की हार्दिक बधाई और शुभकामनाये के साथ……
एम के पाण्डेय निल्को
VMW Team

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चेहरे की वो बात – एम के पाण्डेय ‘निल्को’

चेहरे की वो बात
अधूरी रह गई थी रात
किनारे बैठे थे वे साथ
डाले एक दूसरे मे हाथ
कह रहे थे
सुन रहे थे
एक दूसरे को
बुन रहे थे
और चेहरा पढ़ने की कोशिश मे
एक दूसरे पर हस रहे थे
फिर झटके से टूटा सपना
सब कह रहे है अपना अपना
पर अनुभव भरे इस ज़िंदगी मे
दर्द कर रहा है मेरा टखना
रात रह गई
बात रह गई
सपना टूटा पर
वह साथ ही रह गई
जैसे आई वर्षा की बूंद
पी हो जैसे अमृत की घूट
मस्तिक मे हो रही शब्दो की युद्ध
और सब लग रहा था है ये शुद्ध
रच रहे थे निल्को डूब कर
कौन कराये उनको पार
पूरी कविता पढ़ समझ लो
इतना ही है बस मेरा सार
********************

एम के पाण्डेय निल्को

Valentine Special – आग लगे इस वेलेंटाइन डे को

क्या रोज डे
क्या प्रपोज डे
क्या करे प्रॉमिस डे को
किसे किस करे किस डे को
जब गर्ल फ्रेंड ही नहीं हमारी तो
आग लगे इस वेलेंटाइन डे को
जिस के नीचे बया करते है प्यार अपना
थोड़ा प्यार करे उस पेड़ को
अक्सर धोखा खा जाते है इश्क मे लोग
क्योकि दिल की जगह जिस्म चाहने लगे है लोग
प्यार का प्रदर्शन कुछ इस तरह करते है लोग
जैसे लाज हया बेच आए है वे लोग
विरोधी नहीं है निल्को प्रेम का
मिलता है मुझे भी भेट सप्रेम का
किन्तु प्यार का प्रदर्शन न हो कुछ इस तरह
की लोग कहे की बेशर्म है ये देश का
राज तो अपना भी चला करता है
पसंद करने वालो के दिल मे
और नापसन्द करने वालो के दिमाग मे बसा करता है
देखो अपना तो सीधा सा फंडा है यार
7 days मनाओ वेलेंटाइन का प्यार
आप लोगो से विनीति है बार बार
ध्यान रखे प्यार के लिए न हो वार
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एम के पाण्डेय निल्को


हिन्दी भाषा मे हो रही मिलावट – एम के पाण्डेय ‘निल्को’

     एम के पाण्डेय निल्को

हिन्दी विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है। हिन्दी अपने आप में एक समर्थ भाषा है। इस देश में भाषा के मसले पर हमेशा विवाद रहा है। भारत एक बहुभाषी देश है। हिन्दी भारत में सर्वाधिक बोली जाने वाली तथा समझे जाने वाली भाषा है इसीलिए वह राष्ट्र भाषा के रूप में स्वीकृत है। लेकिन आजकल अन्य भाषाओ जो हिन्दी के साथ घुसपैठ कर रही है यह एक विचारक बिन्दु है । जब से प्रिंट मीडिया खुल के सामने आई है तब से हिन्दी का अन्य भाषाओ के साथ मिलाप बढ़ गया है, ये शब्द ऐसे नहीं कि इनकी जगह अपनी भाषा के सीधे साधे बोलचाल के शब्द लिखे ही न जा सकते हों। जो अर्थ इन मिश्रित शब्दो से निकलता है उसी अर्थ को देने वाले अपनी हिन्दी की भाषा के शब्द आसानी से मिल सकते हैं। पर कुछ चाल ही ऐसी पड गई है कि हिन्दी के शब्द लोगों को पसंद नहीं आते । वे यथा संभव मिश्रित भाषा के शब्द लिखना ही ज़रूरी समझते हैं। फल इसका यह हुआ है कि हिन्दी दो तरह की हो गई है। एक तो वह जो सर्वसाधारण में बोली जाती हैए दूसरी वह जो पुस्तकों और अखबारों में लिखी जाती है। पुस्तकें या अखबारे लिखने का सिर्फ इतना ही मतलब होता है कि जो कुछ उसमें लिखा गया है वह पढ़ने वालों की समझ में आ जाय । जितने ही अधिक लोग उन्हें पढ़ेगे उतना ही अधिक लिखने का मतलब सिद्ध होगा । तब क्या ज़रूरत है कि भाषा क्लिष्ट कर के पढ़ने वालों की संख्या कम की जाय, मिश्रित भाषा के शब्दो से घ्रणा करना उचित नहीं किन्तु इससे खुद का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है । यह एक बड़ी विडंबना है कि जिस भाषा को कश्मीर से कन्याकुमारी तक सारे भारत में समझा जाता हो उस भाषा के प्रति घोर उपेक्षा व अवज्ञा का भाव हमारे राष्ट्रीय हितों की सिद्धि में कहाँ तक सहायक होंगे ? हिन्दी का हर दृष्टि से इतना महत्व होते हुए भी प्रत्येक स्तर पर इसकी इतनी उपेक्षा क्यों ?

यहाँ यह प्रश्न उठता है कि क्या इस मुल्क में बिना भाषा के मिलावट के काम नही चला सकते । सफेदपोश लोगों का उत्तर है – हिन्दी में सामर्थ कहा है ? शब्द कहाँ है ? ऐसी हालत में मेरा मानना है कि विज्ञान, तकनीक, विधि, प्रशासन आदि पुस्तकों के सन्दर्भ में हिन्दी भाषा के क्षमता पर प्रश्न खड़े करने वालों को यह ध्यान देना होगा कि भाषा को बनाया नही जाता बल्कि वह हमें बनाती है। आवश्यकता अविष्कार की जननी होती है। हिन्दी में हमें नए शब्द गढ़ने पड़ेंगे । भाषा एक कल्पवृक्ष के सामान होती है, उसका दोहन करना होता है। हिन्दी भाषा को प्रत्येक क्षेत्र में उत्तरोत्तर विकसित करना है। लेकिन इस तरफ़ कम ही ध्यान दिया गया है और अन्य भाषा को हिन्दी में मिलाकर आसान बनाने की कोशिश की गई । टीवी के निजी चैनलों ने हिन्दी में अंग्रेजी का घालमेल करके हिन्दी को गर्त में और भी नीचे धकेलना शुरू कर दिया और वहां प्रदर्शित होने वाले विज्ञापनों ने तो हिन्दी की चिन्दी की जैसे नीम के पेड़ पर करेला चढ़ गया हो। इसी प्रकार से रोज पढ़े जाने वाले हिन्दी समाचार पत्रों, जिनका प्रभाव लोगों पर सबसे अधिक पड़ता है ने भी वर्तनी तथा व्याकरण की गलतियों पर ध्यान देना बंद कर दिया और पाठकों का हिन्दी ज्ञान अधिक से अधिक दूषित होता चला गया। लेकिन आज जो हिन्दी का स्तर गिरता दिखाई दे रहा है वह पूरी तरह से अंग्रेजी भाषा के बढ़ते प्रभाव के कारण हो रहा है। आज हर जगह लोग अंग्रेजी के प्रयोग को अपना भाषाई प्रतीक बनाते जा रहे हैं। अगर आज आप किसी को बोलते है कि यंत्र तो शायद उसे समझ न आए लेकिन मशीन शब्द हर किसी की समझ में आएगा। इसी प्रकार आज अंग्रेजी के कुछ शब्द प्रचलन में हैं जो सबके समझ में है। इसलिए यह कहना कि पूर्णतया हिन्दी पत्रकारिता या अन्य जगहो में सिर्फ हिन्दी भाषा का प्रयोग ही हो यह तर्क संगत नहीं है। हां यह जरूर है कि हमें अपनी मातृभाषा का सम्मान अवश्य करना चाहिए और उसे अधिक से अधिक प्रयोग में लाने का प्रयास करना चाहिए। भाषा के क्षेत्र में हिंदी का प्रयोग अपनी सहूलियत के हिसाब से होता रहा है। दूसरी बड़ी समस्या यह है कि हम अभी भी यही मानते हैं कि अंग्रेजी हिंदी से बेहतर है। इसलिए जान बूझकर हिंदी को हिंगलिश बना कर काम करना पसंद करते हैं और ऐसा मानते हैं कि अगर मुझे अंग्रेजी नहीं आती तो मेरी तरक्की की राह दोगुनी मुश्किल है। भाषा आम समाज से अलग नहीं है, उसने भी अन्य बोलियों के साथ – साथ विदेशी भाषा के शब्दों को अपना लिया है। इसके साथ ही यह भी सही है कि विचारों की भाषा वही नहीं हो सकती जो बाज़ार में बोली जाती है। भाषा वही विकसित होती है जिसका हाजमा दुरुस्त होए जो अन्य भाषाओं के शब्दों को अपने भीतर शामिल करके उन्हें पचा सके और अपना बना सके। हिन्दी में भी अनेक शब्द ऐसे हैं जिनके विदेशी स्रोत का हमें पता ही नहीं। शुद्ध हिन्दी वाले भले ही कक्ष कहें पर आम आदमी तो कमरा ही कहता है। भाषा में जितना प्रवाह होगा, वह लोगों की जुबान पर उतना जल्दी चढेगी भी , रोजमर्रा के जितनी करीब होगी लोगों का उसकी ओर आकर्षण उतना ही ज्यादा होगा और वह उतनी ही जल्दी अपनाई जाएगी । हिन्दी की वर्तमान स्थिति पर हुए सर्वे में एक सुखद तथ्य सामने आया कि तमाम विषम परिस्थितियों के बावजूद हिन्दी की स्वीकार्यता बढ़ी है। स्वीकार्यता बढ़ने के साथ – साथ इसके व्यावहारिक पक्ष पर भी लोगों ने खुलकर राय व्यक्त की, मसलन लोगों का मानना है कि हिन्दी के अखबारों में अँग्रेजी के प्रयोग का जो प्रचलन बढ़ रहा है वह उचित नहीं है लेकिन ऐसे लोगों की भी तादाद भी कम नहीं है जो भाषा के प्रवाह और सरलता के लिए इस तरह के प्रयोग को सही मानते हैं। कुछ लोगो को ऐसे शब्दों का बढ़ता प्रचलन रास आ रहा है और कुछ लोग शब्दों की मिली – जुली इस खिच़ड़ी को मजबूरी में खा रहे हैं। 


एम के पाण्डेय ‘निल्को’

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पलटना

पलटना एक शब्द नहीं
इसका एक ही अर्थ नहीं
समझ – समझ का अन्तर
और जो न समझे वो बंदर
कुछ लोग पलटा जाते है
धीरे से सरक जाते है
नहीं रहती अपनी ही बात याद उनको
और हमे भूल जाने की बात करते है
किन्तु पलटने से पहले सटना जरूरी है
और आगे बाद मे लिखूगा क्योकि
यह रचना अभी अधूरी है ……………..

एम के पाण्डेय निल्को


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लिखता हूँ बचपन की वो कहानी – एम के पाण्डेय ‘निल्को’

बचपन की वो दुनिया
पचपन की उम्र में भी नहीं भूलती
क्योंकि जो की थी शरारते
वो भी कुछ नहीं कहती ।।  
न तो लोग बुरा मानते
और न ही मुझे मनाते
रूठे और मनाने के खेल से
हम किसी को नहीं सताते ।।
शाम को जब हम छत पर जाते
खेलते कूदते नहीं घबराते
पर आज के इस परिवेश में
हम बचपन को ही खोते पाते ।।
त्योहारों पर करते थे जो मस्ती
देखती रहती थी पूरी बस्ती
पर अब कोई साथ नहीं है
अकेलापन ही है अब सस्ती ।।
वो पेड़ों पर चड़ना और लटकना
मिट्टी में एक दूसरे को पटकना
छुपन छुपाई हो या हो सरकना
इसके लिए है अब तरसना ।।


लिखता हूँ बचपन की वो कहानी
खुद ही यानि निल्कोकी जुबानी
पर यह कलम अब नहीं चलती सुहानी
क्योंकि यह कविता शायद है अभी बाकी …….।।

एम के पाण्डेय निल्को
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