इस ज़माने में जब ढूढने निकला – योगेश पाण्डेय

माना की थोड़ी देर से आया हूँ
नाराज होने का गम भी मैं पाया हूँ
आज उसके शहर में अजनबियों की तरह
पता पूछने की भीड़ में शामिल हूँ
सही पता सही लोग
इस ज़माने में जब ढूढने निकला
पता चला की गलत लेके पता मैं भी निकला
उसके बनने सवरने के याद में मैं आया हूँ
पर उसके नाराज़ होने का गम भी मैं पाया हूँ
उसकी निगाहे जब भी मुझे देखती है
दुविधा की लाइन में सबसे पहले आया हूँ
उसके जुल्फों की तारीफ में
कविता की लाइन उड़ जाया करती है
उसको समेटने की भीड़ में मैं खुद को पाया हूँ
उसके साथ जब घुमने निकला
उसके आगे ही खुद को पाया हूँ
उसकी झील सी आँखों में
खुद को तैरता हुवा पाया हूँ
जब प्यार से योगेश मैं देखता हूँ
कविता की हर एक लाइन उसमें पाया हूँ
फुर्सत में लिखुगा उसके बारे
अभी छुट्टिया मनाने अपने गाँव आया हूँ
शहर की कोई याद नहीं यहाँ
हर जगह सुकून ही यहाँ पाया हूँ
गाँव की गोरी कहु या शहर की तितली
उसकी आँखों में प्यार ही पाया हूँ

योगेश पाण्डेय
(योगेश की युग से साभार)

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s