VMW Team और भूतो की हवेली भानगढ़ किला

हममें से कितने लोग भूतों में विश्वास करते हैं? क्या भूत वाकई में होते हैं? क्या भूतों को देखा जा सकता है? भूतों को मानने वाले तो इन प्रश्नों का जवाब हां में देंगे, मगर न मानने वाले इस धारणा को खारिज कर देंगे। लेकिन भूतों के ठिकाने देखना हर कोई चाहेगा और भानगढ़ जाना कुछ ऐसा ही है। इसे देश का सर्वाधिक डरावना स्थल माना जाता है। हिंदुस्तान को हमेशा से ही रहस्यों , आलौकिक शक्तियों, तंत्रविद्या का देश कहा गया है। जब बात तंत्र विद्या की हो और ऐसे में हम भूत प्रेतों का ज़िक्र न करें तो फिर कहे गए शब्द एक हद तक अधूरे लगते हैं। लेकिन आगे बढ़ने से पहले चंद सवाल। हम लोगों में से कितने ऐसे हैं जो ये मानते और विश्वास करते हैं कि आज भी इस दुनिया में बुरी आत्माओं और भूतों का अस्तित्त्व है? क्या हम किसी भी माध्यम से भूतों से मिल सकते हैं? क्या हम उन्हें देख सकते हैं, उन्हें महसूस कर सकते हैं?

भानगढ़, राजस्थान के अलवर जिले में सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान के एक छोर पर है। यहाँ का किला बहुत प्रसिद्ध है जो ‘भूतहा किला’ माना जाता है। इस किले को आमेर के राजा भगवंत दास ने 1573 में बनवाया था। भगवंत दास के छोटे बेटे और मुगल शहंशाह अकबर के नवरत्नों में शामिल मानसिंह के भाई माधो सिंह ने बाद में इसे अपनी रिहाइश बना लिया।
माधोसिंह के तीन बेटे थे। (१) सुजाणसिंह (२) छत्रसिंह (३) तेजसिंह। माधोसिंह के बाद छत्रसिंह भानगढ़ का शासक हुआ। छत्रसिंह के बेटा अजबसिंह थे। यह भी शाही मनसबदार थे। अजबसिंह ने आपने नाम पर अजबगढ़ बसाया था। अजबसिंह के बेटा काबिलसिंह और इस के बेटा जसवंतसिंह अजबगढ़ में रहे। अजबसिंह के बेटा हरीसिंह भानगढ़ में रहे (वि. सं. १७२२ माघ वदी भानगढ़ की गद्दी पर बैठे)। माधोसिंह के दो वंशज (हरीसिंह के बेटे)औरंग़ज़ेब के समय में मुसलमान हो गये थे। उन्हें भानगढ़ दे दिया गया था। मुगलों के कमज़ोर पड़ने पर महाराजा सवाई जयसिंह जी ने इन्हें मारकर भानगढ़ पर कब्जा कर लिया।

इस किले में प्रवेश करने वाले लोगों को पहले ही चेतावनी दे दी जाती है कि वे सूर्योदय के पूर्व और सूर्यास्त के पश्चात् इस इस किले के आस पास समूचे क्षेत्र में प्रवेश ना करें अन्यथा किले के अन्दर उनके साथ कुछ भी भयानक घट सकता है। ऐसा कहा जाता है कि इस किले में भूत प्रेत का बसेरा है,भारतीय पुरातत्व के द्वारा इस खंडहर को संरक्षित कर दिया गया है।गौर करने वाली बात है जहाँ पुरात्तव विभाग ने हर संरक्षित क्षेत्र में अपने ऑफिस बनवाये है वहीँ इस किले के संरक्षण के लिए पुरातत्व विभाग ने अपना ऑफिस भानगढ़ से दूर बनाया है।

जयपुर और अलबर के बीच स्थित राजस्थान के भानगढ़ के इस किले के बारे में वहां के स्थानीय लोग कहते हैं कि रात्रि के समय इस किले से तरह तरह की भयानक आवाजें आती हैं और साथ ही यह भी कहते हैं कि इस किले के अन्दर जो भी गया वह आज तक वापस नहीं आया है,लेकिन इसका राज क्या है आज तक कोई नहीं जान पाया।
मिथकों के अनुसार भानगढ़ एक गुरु बालू नाथ द्वारा एक शापित स्थान है जिन्होंने इसके मूल निर्माण की मंज़ूरी दी थी लेकिन साथ ही यह चेतावनी भी दी थी कि महल की ऊंचाई इतनी रखी जाये कि उसकी छाया उनके ध्यान स्थान से आगे ना निकले अन्यथा पूरा नगर ध्वस्त हो जायेगा लेकिन राजवंश के राजा अजब सिंह ने गुरु बालू नाथ की इस चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया और उस महल की ऊंचाई बढ़ा दी जिससे की महल की छाया ने गुरु बालू नाथ के ध्यान स्थान को ढंक लिया और तभी से यह महल शापित हो गया।
एक अन्य कहानी के अनुसार राजकुमारी रत्नावती जिसकी खूबसूरती का राजस्थान में कोई सानी नहीं था।जब वह विवाह योग्य हो गई तो उसे जगह जगह से रिश्ते की बात आने लगी।

एक दिन एक तांत्रिक की नज़र उस पर पड़ी तो वह उस पर कला जादू करने की योजना बना बैठा और राजकुमारी के बारे में जासूसी करने लगा।
एक दिन उसने देखा कि राजकुमारी का नौकर राजकुमारी के लिए इत्र खरीद रहा है,तांत्रिक ने अपने काले जादू का मंत्र उस इत्र की बोतल में दाल दिया,लेकिन एक विश्वशनीय व्यक्ति ने राजकुमारी को इस राज के बारे में बता दिया।
राजकुमारी ने वह इत्र की बोतल को चट्टान पर रखा और तांत्रिक को मारने के लिए एक पत्थर लुढ़का दिया,लेकिन मरने से पहले वह समूचे भानगढ़ को श्राप दे गया जिससे कि राजकुमारी सहित सारे भानगढ़ बासियों की म्रत्यु हो गई।
इस तरह की और और भी कई कहानियां हैं जो भानगढ़ के रहस्य पर प्रकाश डालती हैं लेकिन हकीकत क्या है वह आज भी एक रहस्य है।
भानगढ़ का किला चहारदीवारी से घिरा है जिसके अंदर घुसते ही दाहिनी ओर कुछ हवेलियों के अवशेष दिखाई देते हैं। किले के आखिरी छोर पर दोहरे अहाते से घिरा चाार मंजिला महल है। किवदंतियों के अनुसार भानगढ़ का महल कभी सात मंजिला हुआ करता था लेकिन अब इसकी चार मंजिल ही सलामत हैं लेकिन उनमें भी ऊपरी मंजिल लगभग नष्ट हो चुकी है तथा तीसरी मंजिल भी इस कदर जर्जर हो चुकी हैं जो कभी भी भरभरा कर गिर सकती हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग जिस तरह से इस महल का संरक्षण कर रहा है वह भी विभाग की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाता है।

जर्जर होती उऊपरी मंजिलों की दीवारों पर आधा-अधूरी लिपाई की गई है। तीसरी और चौथी मंजिल पर आज भी महल की राजशाही का गवाह रहे संगमरमर और पत्थरों के दरवाजे मौजूद हैं लेकिन उनकी सार-संभाल तक नहीं की जा रही है। 99 फीसदी कमरों की छतें गिर चुकी हैं और जो मौजूद हैं वे भी गिरने की कगार पर हैं। कमरों की ढह रही छतें उनकी प्राचीनता का अहसास तो कराती हैं लेकिन उनके संरक्षण में लापरवाही को भी उजागर करती हैं। महल की दीवारें जिस तरह से छलनी नजर आती हैं उससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि खजाने की तलाश में बीते दशकों में किस बेदर्दी से इन्हें खोदा गया है। ऊपरी मंजिल में महल की दीवारों और कमरों के मलबे का ढेर लगा है जिसमें मौजूद नक्काशीदार पत्थर इस बात का अहसास कराते हैं कि कभी यह महल कितना संपन्न रहा होगा। दूसरी मंजिल में बाहर से तो दीवारों और सीढिय़ों की मरम्मत की गई है लेकिन अंदर के कमरों की बदहाली देखने से ही नजर आती है। कमरों की दीवारें और छतें चमगादड़ों की बींट से खराब होती जा रही हैं लेकिन उनकी साफ-सफाई शायद सालों से नहीं की गई हैं। दिलचस्प बात यह है कि भानगढ़ के किले के अंदर मंदिरों में पूजा नहीं की जाती। गोपीनाथ मंदिर में तो कोई मूर्ति भी नहीं है। तांत्रिक अनुष्ठानों के लिए अक्सर उन अंधेरे कोनों और तंग कोठरियों का इस्तेमाल किया जाता है जहां तक आम तौर पर सैलानियों की पहुंच नहीं होती। किले के बाहर पहाड़ पर बनी एक छतरी तांत्रिकों की साधना का प्रमुख अड्डा बताई जाती है। इस छतरी के बारे में कहा जाता है कि भानगढ़ की बरबादी का कारण रहा तांत्रिक सिंघिया वहीं रहा करता था। किले में स्थित महल तथा खंडहरों में सिंदूर, राख के ढेर, पूजा के सामान, चिमटों और त्रिशूलों के अलावा लोहे की मोटी जंजीरें भी मिलती हैं जो तांत्रिक अनुष्ठानों का सबूत हैं।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने किले के द्वार पर एक बोर्ड लगा रखा है। इस पर लिखा है कि सूर्यास्त के बाद से लेकर सूर्योदय तक किले के अंदर पर्यटकों के रुकने पर मनाही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस भी व्यक्ति ने सूर्यास्त के बाद अंदर रुकने की कोशिश की है, वह लापता हो गया है। लिहाजा मन में कई सारे अनुत्तरित सवालों के साथ अन्य लोगों की तरह हमने भी ( योगेश जी, विजय जी, मधुलेश जी, अभिषेक जी,मोहक जी, सिद्धार्थ जी, निलेश जी, सुन्दरम जी) सूर्यास्त से पहले उस स्थान को छोड़ दिया।

Bhangarh is a town in India that is famous for its historical ruins

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