Monthly Archives: June 2013

प्रकृति का सफाई अभियान


गाँव शहर और सड़क तक भर गया पानी
और याद आ गई सबको अपनी नानी
तो निल्को ने कहा –
परेशान मत हो मेरे बाबू
क्योकि यंहा प्रकृति का सफाई अभियान है चालू
नदियो का पानी आपे से बाहर हो रहा
लोगो का जीवन इससे दुसवार हो रहा
जिसे लोग बाढ़ कह कर परेशान है
वह तो प्रकृति का सफाई अभियान है
प्रकृति अपनी सफाई अलग तरीके से करती है
यही बात तो लोगो को अखरती है
प्रकृति के इस बर्ताव से
मानवता घायल हो जाती है
और इस बरसात के मौसम मे
नदिया पागल हो जाती है
प्रकृति जब नि:शुल्क सब देती है
तो ब्याज सहित वसूलती है
प्रकृति कभी भी जेल बना देती है
और आगे विज्ञान भी फेल हो जाती है
जब – जब प्रकृति से छेड़-छाड़ हुई
नुकसान मनुष्य का होता है
यह अटल सत्य है
जिस पर विश्वास सभी का होता है
गर प्रकृति को किया परेशान
तो खुद परेशान हो जाओगे
नहीं बचेगा नामो-निशान
और आदिवासी कहलाओगे
कर रहा मधुलेश निवेदन
मत काटो हरियाली को
गर फिरा इसका दिमाग तो
नहीं दिखेगा यह बागवानी तो
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मधुलेश पाण्डेय “निल्को”

इस बरसात के मौसम मे …..


इस बरसात के मौसम मे …..
आज लगा हवा
मौसम से रूठ गई
काले घने बादल
शहर मे ही रह गई
तन तो भीगा ही भीगा
मन भी बह गई
और बहकी – बहकी बाते
मुह मे ही रह गई
इस बरसात के मौसम मे
नजारे हरे भरे है
लेकिन ज़िंदगी के इस सफर मे
इस किनारे हम खड़े है
आज इस दौर मे
है सब कुछ मेरे पास
पर मन मानो कर रहा
बस कविताई ही रह गई
आज का दिन तो ऐसे निकला
की बात कहानी हो गई
मौसम ने भी साथ दिया
और शाम सुहानी हो गई
बारिश की बूदे
जब – जब तन पर गिरि
तब – तब कविता की
एक लाइन पूरी हो गई
कविता का शौक “निल्को” को नहीं
पर इस मौसम ने यह काम भी कर गई ।

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मधुलेश पाण्डेय “निल्को”

‘काबिल बनो कामयाबी तो झक मार कर पीछे आएगी।’

YOGESH PANDEY


काबिल बनो कामयाबी तो झक मार करपीछे आएगी।
कभी कभी लोग अपने रिश्तों को भूलकर अपने सपनों के पीछे ही भागते रहतेहैं और उन्हें कुछ समय बाद एहसास होता है कि वो अपनों से कितने दूर चले आए हैंइस विचार  के साथ कि जिन्दगीइतनी उलझी हुई नहीं है जितना हम उलझा देते हैं समाज में बदलाव की शुरुआत स्वयं करनी पड़ती है  थ्री इडियट्स फिल्म को समाज के  हर वर्ग ने बहुत पसंद किया क्योंकि उसमें कॉलेज की मस्ती के साथ-साथ उनसे जुडी समस्या ओर उनके समाधान भी फिल्म को हीरो रंचो बहुत ही आसानी से सुलझा लेता है यह तो एक मजेदार भूल भूलैया है थोड़ी सी समझदारी से सुलझायंगे तो आसानी से सुलझ जायगी।  फिल्म का एक डायलॉग जो वास्तव में प्रभावशाली है वह है काबिल बनो कामयाबी तो झक मार करपीछे आएगी। कई बार लिखने केबाद  खुद को बदला बदला सा पाता हूँ इसी देश में मैंने अच्छे दोस्त बनाए, और इसी देश में मुझे कई लोग ऐसे भीमिलेजो मुझे कतई पसंद नहीं आए लेकिन कुछ देर भी गंभीरता से सोचता हूं तो एहसास होता है कि किसी का हमें पसंद या नापसंद आना सिर्फ उसके अच्छे या  बुरे होने पर नहीं, हमारी सोच पर निर्भर करता है आखिर जिन्हें मैं बुरा समझता हूं  उनके भी कुछ दोस्त तो हैं ही उनके परिवार के लोग तो उन्हें प्यार करते ही हैं सोकहीं न कहीं उनमें कुछ गुण या अच्छाइयां होंगी ही उन्हें भुलाना मुश्किलहै हम जानते है कि कहीं-कही किसी परिस्थिति में हम कुछ नहीं कर सकते हैं फिर भी परेशान हो जाते हैं। गलती करने के बाद  भी सजा और गुस्से की जगह जब प्यार और स्नेह मिलता हैतो वो एहसास कुछ अलग कीहोता है ज़िन्दगी की जिम्मेदारियों से सामना होने के बाद कुछ  व्यक्ति खुद को करियर के ठहराव और अति यहएहसास होता है  कि वास्तविक संसार उसके उसकी कल्पना के संसार से दुष्कर ज्यादा प्रतिस्पर्धी और कम क्षमाशीलहै जिससमय  समाज में खिंचाव तनाव व विषयों के भोग का आकर्षण जीव को अपनी महिमा से गिराते हैं  लेकिनकुछ  ही समय बाद  धीरे-धीरे वे बातें दिमाग से खारिज होने लगती हैं और हमारा व्यवहार पहले की तरह ही हो जाताहै एकआम धारणा है, अगर इंसान कामयाब है तो वो काबिल होगा ही! हालांकि व्यक्तिगत कामयाबी पर यह सोचनाशायद गलत होगा। इंसान को व्यक्तिगत कामयाबी उसे विरासत में मिल सकती है या उसके तिकड़म और चापलूसी से मिल सकती है ।

 

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अपराध की समाचार से भरल अखबार

मनबोध मास्टर बिहाने-बिहाने अखबार खोलते माथा पीट लिहलन। अपराध की समाचार से भरल अखबार देख के दिमाग चकरा गइल। देवरिया की एम पी साहब की मुनीब से भी दु लाख छिना गइल। कूड़ाघाट में सत्या के गहना छिना गइल। रेलवे के जीएम आफिस की समनवे बैंक से पैसा निकाल के आवत रिटायर रेलकर्मी लुटा गइलें। दिव्यनगर में रंगदारी खातिर घर पर चढ़ के बदमाश फायरिंग कइलें। रेती चौक पर रिक्शा से जात बैंककर्मी पर तमंचा तान के बदमाश नकदी लूट लिहलन। सिसवा आ कप्तानगंज की बीचे जननायक ट्रेन में जीआरपी वाला एगो व्यापारी के लूट लिहलन। बस्ती, सिद्धार्थनगर, संतकबीर नगर, कुशीनगर में लूट-छिनैती के तमाम समाचार से अखबार अंड़सल रहे। लगत बा लूट के छूट मिल गइल बा। कुशीनगर वाला स्वर्गीय धरीक्षण बाबा के कविता याद आ गइल-‘ गुंडा स्वतंत्र, गोली स्वतंत्र/ बदमाशन के टोली स्वतंत्र/ छूरा स्वतंत्र, कट्टा स्वतंत्र, हिस्ट्रीशीटर पट्ठा स्वतंत्र..।’ एतना लुटात-पिटात, मरात-कुचात मनई की मन में एक बात के संतोष बा। संतोष येह बात के की बाबुजी (नेताजी)के वयान भी आजुए की अखबार में आइल बा। वयान के लब्बोलुआब इ बा कि बाबुजी के कहनाम बा कि हम राजा रहतिन त 15 दिन में व्यवस्था सुधार देतीं। मतलब साफ बा कि राज-काज ठीक नेइखे चलत। इ बाबुजी के भलमनसहित बा कि बेटा के कसत हवें कि पुत्तर पेंच कस दें। बाबुजी के नराजगी मीडिया से बा। कहत हवें- सरकार ने अच्छा काम ना लउकत बा। बाबुजी! माफ करब, कइसे समझावल जा। सफेद चकाचक कमीज पर यदि कहीं दाग लउकी त निगाह ओहीं न पहिले जाई। येह में निगाह के कवन दोष बा। दागदार कमीज पहने वाला के चाहीं कि दाग धोआ दें। राजनीतिक दल जहां एक ओर सूचना अधिकार अधिनियम के खुल्लमखुला विरोध करत हवें वहीं बाबुजी सीना ठोंक के कहत हवें कि पुत्तर के राज-काज ठीक ना चलत बा। येह के कहल जाला पारदर्शिता, ईमानदारी से स्वीकारोक्ति। बाबुजी का ठीक से पता बा कि कानून -व्यवस्था के चुनौती देबे वालन तत्वन पर लगाम ना लगावला की चलते ही 2007 की चुनाव में उनकी पार्टी से सरकार में गइला के ही लगाम लाग गइल रहे। लेकिन एगो सवाल सीना में चुभत अइसन लागत बा, उ इ कि जब बाबुजी के पार्टी सरकार में आवेले तबे बदमाशी काहें बढ़ि जाला? 
लूट के छूट मिलल जइसे, रोज लुटात हवें नर-नारी। 
अइसे ही राज चलि यदि भाय, त उत्तम प्रदेश होय गुणकारी।।
 ढील बा पेंच, की मिस बा चूड़ी, की मूड़ी पर कइलें शनिचर सवारी।
 बाप कहें हम ठीक कर देतीं, बेटवा तूहीं दिहलù ह राज बिगारी।।

भावनाएं प्रदर्शित करने के लिए ही होती हैं

भावनाएं प्रदर्शित करने के लिए ही होती हैं इसलिए उन्हें छुपाना नहीं जाहिर करना चाहिए। बिना प्रयास करे हारने से कोशिश करके हारना बेहतर है क्योंकि खामोशी ज्यादा दर्द देती है…. एम के पाण्डेय “निल्को”


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