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मनमोहन सा फील करता हूँ

आज कहने को कुछ नहीं ..
इस लिए अपना मुहं सील करता हूँ ।
अगर काफी देर कुछ ना कहूँ तो .
मनमोहन सा फील करता हूँ”
 आज  कुछ विचार आप के लिए ……………….

डिस्टेंस लर्निंग कोर्स (दूरस्थ शिक्षा पाठ्यक्रम)


ऐसे युवा जो नौकरी करते हुए या अन्य किसी अन्य कारण से अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते हैं या ऐसे लोग जिनमें लगातार पढ़ने की ललक रहती है, ऐसे लोगों के लिए डिस्टेंस लर्निंग कोर्स (दूरस्थ शिक्षा पाठ्यक्रम) एक बेहतर विकल्प है।
ये ओपन विद्यालय घर बैठे विद्यार्थियों को पाठ्‍यक्रम उपलब्ध कराकर उन्हें डिग्रियां प्रदान करने हैं। इंदिरा गांधी ओपन यूनिवर्सिटी (इग्नू) दूरस्थ शिक्षा का देश में सबसे बड़ा संस्थान है। इसके अलावा भी कई प्रायवेट संस्थान हैं जो स्टूडेंट्‍स को डिग्रियां प्रदान करते हैं। इन विश्वविद्यालय या संस्थानों को यूजीसी द्वारा मान्यता भी प्राप्त होती है।
   देश के विश्वविद्यालयों में रेगुलर कोर्स में दाखिले के तामझाम और अड़चनों ने पत्राचार माध्यम को अब खूब लोकप्रिय बना दिया है। छात्रों की एक बड़ी तादाद मजबूरी में या मनपसंद ढंग से पढ़ने के लिए इस माध्यम की ओर तेजी से कदम बढ़ा रही है। क्लास और हर दिन की हाजिरी के झंझट से मुक्त होकर पढ़ने की आजादी देने वाला यह माध्यम अब देश के कई विश्वविद्यालयों में मौजूद है। रेडीमेड स्टडी मटेरियल के बलबूते कोर्स पूरा करने का शॉर्टकट रास्ता बता कर यह गांव से लेकर शहर तक के छात्रों के बीच अपनी पहुंच बखूबी बना रहा है। डिस्टेंस लर्निंग कोर्स (दूरस्थ शिक्षा पाठ्यक्रम) या नियमित रूप के माध्यम के कोई भी कोर्स ( PGDM Course, MBA Course, MCA Course and BBA, BCA & B.Com-Hons. Course etc ) करने के लिए आप हमे +91-7891155009 पर फोन कर सकते है ।

एतना घोटाला की बाद भी देश चल रहल बा, इ सब कुछ पुण्यप्रतापी लोग के देन बा।

मनबोध मास्टर का नेता नाम से ही घिन हो गइल बा। एतना घिन जइसे नेता ना नेटा(पोंटा) होखें। घोटाला पर घोटाला होत देख बोल पड़लें- ‘ साग घोटाला, पात घोटाला। सुबह-शाम और रात घोटाला।
पाथर के हाथी बा खइलसि, 15 अरब के डाढ़ा।
 मंत्री जी लोग गटक रहल बा, घोटाला के काढ़ा।। 
लोकायुक्त किये खुलासा, बात कहत हैं पक्की।
 दो सौ जने आरोपित भइलें, कब पिसिहें जेल में चक्की।। 



यह भी नशा, वह भी नशा – प्रेमचंद

 होली के दिन राय साहब पण्डित घसीटेलाल की बारहदरी में भंग छन रही थी कि सहसा मालूम हुआ, जिलाधीश मिस्टर बुल आ रहे हैं। बुल साहब बहुत ही मिलनसार आदमी थे और अभी हाल ही में विलायत से आये थे। भारतीय रीति-नीति के जिज्ञासु थे, बहुधा मेले-ठेलों में जाते थे। शायद इस विषय पर कोई बड़ी किताब लिख रहे थे। उनकी खबर पाते ही यहाँ बड़ी खलबली मच गयी। सब-के-सब नंग-धिड़ंग, मूसरचन्द बने भंग छान रहे थे। कौन जानता था कि इस वक्त साहब आएँगे। फुर-से भागे, कोई ऊपर जा छिपा, कोई घर में भागा, पर बिचारे राय साहब जहाँ के तहाँ निश्चल बैठे रह गये। आधा घण्टे में तो आप काँखकर उठते थे और घण्टे भर में एक कदम रखते थे, इस भगदड़ में कैसे भागते। जब देखा कि अब प्राण बचने का कोई उपाय नहीं है, तो ऐसा मुँह बना लिया मानो वह जान बूझकर इस स्वदेशी ठाट से साहब का स्वागत करने को बैठे हैं। साहब ने बरामदे में आते ही कहा-हलो राय साहब, आज तो आपका होली है?
राय साहब ने हाथ बाँधकर कहा-हाँ सरकार, होली है।
बुल-खूब लाल रंग खेलता है?
राय साहब-हाँ सरकार, आज के दिन की यही बहार है।
साहब ने पिचकारी उठा ली। सामने मटकों में गुलाल रखा हुआ था। बुल ने पिचकारी भरकर पण्डितजी के मुँह पर छोड़ दी तो पण्डितजी नहीं उठे। धन्य भाग! कैसे यह सौभाग्य प्राप्त हो सकता है। वाह रे हाकिम! इसे प्रजावात्सल्य कहते हैं। आह! इस वक्त सेठ जोखनराम होते तो दिखा देता कि यहाँ जिला में अफसर इतनी कृपा करते हैं। बताएँ आकर कि उन पर किसी गोरे ने भी पिचकारी छोड़ी है, जिलाधीश का कहना ही क्या। यह पूर्व-तपस्या का फल है, और कुछ नहीं। कोई पहले एक सहस्र वर्ष तपस्या करे, तब यह परम पद पा सकता है। हाथ जोडक़र बोले-धर्मावतार, आज जीवन सफल हो गया। जब सरकार ने होली खेली है तो मुझे भी हुक्म मिले कि अपने हृदय की अभिलाषा पूरी कर लूँ।
यह कहकर राय साहब ने गुलाल का एक टीका साहब के माथे पर लगा दिया।
बुल-इस बड़े बरतन में क्या रखा है, राय साहब?
राय-सरकार, यह भंग है। बहुत विधिपूर्वक बनाई गयी है हुजूर!
बुल-इसके पीने से क्या होगा?
राय-हुजूर की आँखें खुल जाएँगी। बड़ी विलक्षण वस्तु है सरकार।
बुल-हम भी पीएगा।
राय साहब को जान पड़ा मानो स्वर्ग के द्वार खुल गये हैं और वह पुष्पक विमान पर बैठे ऊपर उड़े चले जा रहे हैं। ग्लास तो साहब को देना उचित न था, पर कुल्हड़ में देते संकोच होता था। आखिर बहुत ऊँच-नीच सोचकर ग्लास में भंग उँड़ेली और साहब को दी। साहब पी गये। मारे सुगन्ध के चित्त प्रसन्न हो गया।
दूसरे दिन राय साहब इस मुलाकात का जवाब देने चले। प्रात:काल ज्योतिषी से मुहूर्त पूछा। पहर रात गये साइत बनती थी, अतएव दिन-भर खूब तैयारियाँ कीं। ठीक समय पर चले। साहब उस समय भोजन कर रहे थे। खबर पाते ही सलाम दिया। राय साहब अन्दर गये तो शराब की दुर्गन्ध से नाक फटने लगी। बेचारे अंग्रेजी दवा न पीते थे, अपनी उम्र में शराब कभी न छुई थी। जी में आया कि नाक बन्द कर लें, मगर डरे कि साहब बुरा न मान जाएँ। जी मचला रहा था, पर साँस रोके बैठे हुए थे। साहब ने एक चुस्की ली और ग्लास मेज पर रखते हुए बोले-राय साहब हम कल आप का बंग पी गया, आज आपको हमारा बंग पीना पड़ेगा। आपका बंग बहुत अच्छा था। हम बहुत-सा खाना खा गया।
राय-हुजूर, हम लोग मदिरा हाथ से भी नहीं छूते। हमारे शास्त्रों में इसको छूना पाप कहा गया है।
बुल-(हँसकर) नहीं, नहीं, आपको पीना पड़ेगा राय साहब! पाप-पुन कुछ नहीं है। यह हमारा बंग है, वह आपका बंग है। कोई फरक नहीं है। उससे भी नशा होता है, इससे भी नशा होता है, फिर फरक कैसा?
राय-नहीं, धर्मावतार, मदिरा को हमारे यहाँ वर्जित किया गया है।
बुल-ऐसा कभी होने नहीं सकता। शास्त्र मना करेगा तो इसको भी मना करेगा, उसको भी मना करेगा। अफीम को भी मना करेगा। आप इसको पिएँ, डरें नहीं। बहुत अच्छा है।
यह कहते हुए साहब ने एक ग्लास में शराब उँड़ेलकर राय साहब के मुँह से लगा ही तो दी। राय साहब ने मुँह फेर लिया और आँखें बन्द करके दोनों हाथों से साहब का हाथ हटाने लगे। साहब की समझ में यह रहस्य न आता था। वह यही समझ रहे थे कि यह डर के मारे नहीं पी रहे हैं। अपने मजबूत हाथों से राय साहब की गरदन पकड़ी और ग्लास मुँह की तरफ बढ़ाया। राय साहब को अब क्रोध आ गया। साहब खातिर से सब कुछ कर सकते थे; पर धर्म नहीं छोड़ सकते थे। जरा कठोर स्वर में बोले-हुजूर, हम वैष्णव हैं। हम इसे छूना भी पाप समझते हैं।
राय साहब इसके आगे और कुछ न कह सके। मारे आवेश में कण्ठावरोध हो गया। एक क्षण बाद जरा स्वर को संयत करके फिर बोले-हुजूर, भंग पवित्र वस्तु है। ऋषि, मुनि, साधु, महात्मा, देवी, देवता सब इसका सेवन करते हैं। सरकार, हमारे यहाँ इसकी बड़ी महिमा लिखी है। कौन ऐसा पण्डित है, जो बूटी न छानता हो। लेकिन मदिरा का तो सरकार, हम नाम लेना भी पाप समझते हैं।
बुल ने ग्लास हटा लिया और कुरसी पर बैठकर बोला-तुम पागल का माफिक बात करता है। धरम का किताब बंग और शराब दोनों को बुरा कहता है। तुम उसको ठीक नहीं समझता। नशा को इसलिए सारा दुनिया बुरा कहता है कि इससे आदमी का अकल खत्म हो जाता है। तो बंग पीने से पण्डित और देवता लोग का अकल कैसे खप्त नहीं होगा, यह हम नहीं समझ सकता। तुम्हारा पण्डित लोग बंग पीकर राक्षस क्यों नहीं होता! हम समझता है कि तुम्हारा पण्डित लोग बंग पीकर खप्त हो गया है, तभी तो वह कहता है, यह अछूत है, वह नापाक है, रोटी नहीं खाएगा, मिठाई खाएगा। हम छू लें तो तुम पानी नहीं पीएगा। यह सब खप्त लोगों का बात। अच्छा सलाम!
राय साहब की जान-में-जान आयी। गिरते-पड़ते बरामदे में आये, गाड़ी पर बैठे और घर की राह ली।

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एक तिनका

मैं घमंडों में भरा ऐंठा हुआ।
एक दिन जब था मुँडेरे पर खड़ा।
आ अचानक दूर से उड़ता हुआ।
एक तिनका आँख में मेरी पड़ा।।

मैं झिझक उठा, हुआ बेचैन सा।
लाल होकर आँख भी दुखने लगी।
मूँठ देने लोग कपड़े की लगे।
ऐंठ बेचारी दबे पाँवों भगी।।

जब किसी ढब से निकल तिनका गया।
तब ‘समझ’ ने यों मुझे ताने दिये।
ऐंठता तू किसलिए इतना रहा।
एक तिनका है बहुत तेरे लिए।। 

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

भारत की लोक कथा – चिड़िया की दाल

एक थी चिड़िया चूं-चूं। एक दिन उसे कहीं से दाल का एक दाना मिला। वह गई चक्की के पास और दाना दलने को कहा। कहते-कहते ही वह दाना चक्की में जा गिरा। चिड़िया ने दाना मांगा तो चक्की बोली-
‘बढ़ई से चक्की चिरवा ले, अपना दाना वापस पा ले।’

चिड़िया बढ़ई के पास पहुंची। उसने बढ़ई से कहा-‘बढ़ई, तुम खूंटा चीरों, मेरी दाल वापस ला दो।’ बढ़ई के पास इतना समय कहां था कि वह छोटी-सी चिड़िया की बात सुनता? चिड़िया भागी राजा के पास। राजा घिरा बैठा था चापूलसों से।

उसने चूं-चूं को भगा दिया। वह भागी रानी के पास, रानी सोने की कंघी से बाल बना रही थी। उसने चूं-चूं से कहा। ‘भूल जा अपना दाना, आ मैं खिलाऊं तुझको मोती।’

‘मोती भी भला खाए जाते हैं? चिड़िया ने सांप से कहा, ‘सांप-सांप, रानी को डस ले।’

“रानी, राजा को नहीं मनाती
राजा बढ़ई को नहीं डांटता
बढ़ई खूंटा नहीं चीरता
मेरी दाल का दाना नहीं मिलता।”

सांप भी खा-पीकर मस्ती में पड़ा था। उसने सुनी-अनसुनी कर दी। चूं-चूं ने लाठी से कहा-‘लाठी-लाठी तोड़ दे सांप की गर्दन।’ अरे! यह क्या! लाठी तो उसी पर गिरने वाली थी।

चूं-चूं जान बचाकर भागी आग के पास। आग से बोली-‘जरा लाठी की ऐंठ निकाल दो। उसे जलाकर कोयला कर दो।’ आग न मानी। चूं-चूं का गुस्सा और भी बढ़ गया। उसने समुद्र से कहा-‘इतना पानी तेरे पास, जरा बुझा तो इस आग को।’ समुद्र तो अपनी ही दुनिया में मस्त था। उसकी लहरों के शोर में चूं-चूं की आवाज दबकर रह गई।

एक हाथी चूं-चूं का दोस्त था मोटूमल। वह भागी-भागी पहुंची उसके पास। मोटूमल ससुराल जाने की तैयारी में था। उसने तो चूं-चूं की राम-राम का जवाब तक न दिया। तब चूं-चूं को अपनी सहेली चींटी रानी की याद आई।

कहते हैं कि मुसीबत के समय दोस्त ही काम में आते हैं। चींटी रानी ने चूं-चूं को पानी पिलाया और अपनी सेना के साथ चल पड़ी। मोटूमल इतनी चींटियों को देखकर डर गया और बोला-‘हमें मारे-वारे न कोए, हम तो समुद्र सोखब लोए।’ (मुझे मत मारो, मैं अभी समुद्र को सुखाता हूं।)

इसी तरह समुद्र डरकर बोला-‘हमें सोखे-वोखे न कोए, हम तो आग बुझाएवे लोए।’ और देखते-ही-देखते सभी सीधे हो गए। आग ने लाठी को धमकाया, लाठी सांप पर लपकी, सांप रानी को काटने दौड़ा, रानी ने राजा को समझाया, राजा ने बढ़ई को डांटा, बढ़ई आरी लेकर दौड़ा।

अब तो चक्की के होश उड़ गए। छोटी-सी चूं-चूं ने अपनी हिम्मत के बल पर इतने लोगों को झुका दिया। चक्की आरी देखकर चिल्लाई-‘हमें चीरे-वीरे न कोए, हम तो दाना उगलिने लोए।’ (मुझे मत चीरों, मैं अभी दाना उगल देती हूं।)

चूं-चूं चिड़िया ने अपना दाना लिया और फुर्र से उड़ गई।

प्रस्तुति : गजेन्द्र ओझा

गाँव ! प्रकृति और मनुष्य की संगमस्थली!

नहीं समझ में आ रहा है बात शुरू कहाँ से करूँ? शीर्षक देने का भी मन नहीं हो रहा। मेरे गाँव का विडियो आप के लिए त्रिपुरेन्द्र के कैमरे से 


गाँव !

प्रकृति और मनुष्य की संगमस्थली!

जी हाँ,जिस जगह पर प्रकृति मनुष्य को सीने से लगाती है,वही गाँव है. इसीलिए गाँव जीवनदायिनी है. भोजन के लिए अनाज से लेकर फूल,फल और औषधि के लिए जड़ी-बूटियाँ भी गाँव से ही हमें प्राप्त होते हैं. गाँव किसी भी देश के विकास में अपना बहुमूल्य योगदान करते हैं.

पिछले कुछ दिनों से मुझे मेरा घर बहुत याद आ रहा है 

मेरे गाँव में  एक  घर है आँगन, ओसार, दालान और छोटे-छोटे कमरों वाले उस बड़े से घर से धुँए, सौंधी मिट्टी, गुड़(राब) और दादी के रखे- उठे हुए सिरके की मिली-जुली गंध आती है   घर के बीच के बड़े से दुआर में कई छोटे-बड़े पेड़ों के साथ मीठे फल और ठंडी छाँव वाला एक श्री फल  का पेड़ है  जिसके बारे में अम्मा बताती थीं कि जब वो नयी-नयी ब्याह के आयी थीं, तो सावन में उस पर झूला पड़ता था. गाँव की बहुएँ और लड़कियाँ झूला झूलते हुए कजरी गाती थीं. हमने न कजरी सुना और न झूला झूले, पर आम के मीठे फल खाये और उसकी छाया का आनंद उठाया. तब हर देसी आम के स्वाद के आधार पर अलग-अलग नाम हुआ करते थे. उस पेड़ के दो नाम थे “निमिअव ” “तनकिहावा “मल्दाहावा ” और “मिठउआ.”………. जहा मधुलेश, त्रिपुरेन्द्र, गजेन्द्र, योगेश , अनु , अभिषेक खूब खेला है वो भी ऐसे- २ खेल जिसका नाम सुनने पर हसी आती है  जैसे हाड़ी मुवावान , गाय पकड़ आदि ……….कभी फिर से एक नए अंदाज में अपना बचपन लिखुगा  तब तक के लिए ………. प्रणाम !

हमारे गाँव के सारे बुज़ुर्ग कहते हैं

बड़े शहरों में बहुत छोटे लोग रहते हैं।

गाँव से शहर में आए तो ये मालूम हुआ

घर नहीं दिल भी यहाँ पत्थरों के होते हैं।

कोशिश तो की बहुत मगर दिल तक नहीं पहुँचे

वो शहर के थे हाथ मिलाकर चले गए।

किसके दिल में है क्या अंदाज़ा नहीं मिलता है

शहर-ए-दीवार का दरवाज़ा नहीं मिलता है।

मर के वो अपने खून से तहरीर लिख गया

इक अजनबी को शहर में पानी नहीं मिला।

फूलों की न उम्मीद करो आके शहर में

घर में यहाँ तुलसी की जगह नागफनी है।

होटल का ताज़ा खाना भी स्वाद नहीं दे पाता है

माँ के हाथ की बासी रोटी मक्खन जैसी लगती है।

होठों पर मुस्कान समेटे दिल में पैनी आरी है

बाहर से भोले-भाले हैं भीतर से होशियारी है।

भूखे प्यासे पूछ रहे हैं रो-रो कर राजधानी से

कब तक हम लाचार रहेंगे आख़िर रोटी पानी से।

जब तक पैसा था बस्ती के सबके सब घर अपने

थे

जब हाथों को फैलाया सबके दरवाज़े बंद मिले।

मशरूफ़ हैं सब, दौरे-तरक्की के नाम पर

कोई भी मेरे शहर में खाली नहीं मिलता।



सौजन्य- मधुलेश पाण्डेय “निल्को” 

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