…..और जब वो बड़ी हो जाएं तो सत्ता में बैठे मठाधीश ही सबसे पहले उनको भोग की वस्तु बना डालते हैं।

पूरा देश लक्ष्मी की पूजा करता है दीपावली पर। दुर्गा की पूजा करता है नवरात्रा में, नौ दिन। सरकारें अरबों रूपए चाट रही हैं- ‘बेटी बचाओ’,  ’कन्या भू्रण’, ‘बेटी पढ़ाओ’, ‘शादी करवाओ’,  ’उनको मुफ्त शिक्षा दो’, ‘किताबें, यूनिफॉर्म, साइकिलें बांटों।’ और जब वो बड़ी हो जाएं तो सत्ता में बैठे मठाधीश ही सबसे पहले उनको भोग की वस्तु बना डालते हैं।
राजस्थान का भंवरीदेवी कांड तो एक मंत्री और विधायक का कारनामा निकला। ऎसे ही कारनामे में रामलाल जाट ने तो मंत्री पद खोया। भोपाल का शहला मसूद कांड, एक पाष्ाüद का हत्याकांड मध्यप्रदेश सरकार के मुंह पर आज भी कालिख पोत रहे हैं। दिल्ली में एक बस में गैंग रेप हुआ तो पूरे देश में भूचाल आ गया।
यहां तो सत्ता के मद में आए दिन बलात्कार, हत्याएं, गैंग रेप होते ही रहते हैं। मध्यप्रदेश में एक सप्ताह में 4 सामूहिक बलात्कार और 28 बलात्कार की घटनाएं हुई हैं। इस हालात में प्रदेश के गृह मंत्री को तो अपने पद पर बने रहने का कोई नैतिक अघिकार ही नहीं है। ऎसी ही कालिख अन्य प्रदेशों में भी पुत रही है। मुझे तो ऎसे प्रदेश और देश में जीने में ही शर्म आ रही है। इन सत्ताधारियों ने पुलिस के भी हाथ काट रखे हैं। माफिया जाति का पोषण भी इनकी काली कमाई कर रही है।
दिल्ली तो सरताज है। बड़े नेता और नेत्रियों का इतिहास माफिया के साथ हर पन्ने पर लिखा है। नैना साहनी का काला दिन आज भी पढ़ा जा रहा है। सत्ता के दरिंदें गली-गली में फैल गए। खुले आम किस्मत के बदले अस्मत मांगने लग गए। हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश को तो इस चक्कर में त्यागपत्र देना पड़ा था।
सबसे बड़ा आश्चर्य तो यह है कि सत्ताधारी ही इनको सजा दिलाने के बजाए बचाने में जुट जाते हैं।  समझ में नहीं आता कि असुर कौन है? अपराधी या इनको बचाने वाले सत्ता के शीर्ष पुरूष्ा! एक को शर्म नहीं आती, बल्कि किसी एक को बचाने के लिए पुलिस अथवा सीबीआई के जरिए दूसरे को फंसा देते हैं। कहानी को ही तोड़-मरोड़ कर दूसरा रूप दे देते हैं। हत्या का श्रेय, गैंग रेप का श्रेय इनको भी जाता है। ये ही अपराध की प्रतिष्ठा करने के लिए जिम्मेदार हैं। जो न्यायाधीश जान-बूझकर आंखें बंद कर लेते हैं, ईश्वर उनको कभी नहीं छोड़ेगा।
दिल्ली जैसी घटना कहीं नहीं होनी चाहिए पर मीडिया को भी समाज और देश का मुंह काला करने वाली ऎसी हर घटना पर आक्रामक दिखना चाहिए। उसे किसी भी राज्य अथवा छोटे शहर-गांव में होने वाली घटना को हाशिए पर नहीं डाल देना चाहिए। जनता को भी उनसे वैसे ही जुड़ना चाहिए, जुलूस निकालने चाहिए जैसे दिल्ली की घटना पर निकले। दिल्ली और प्रदेशों के लोगों में इतना बड़ा भेद क्यों? क्या वहां का लोकतंत्र भिन्न हैं? क्या मध्यप्रदेश में विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका (विशेषकर पुलिस)  भिन्न है? क्या लोगों की संस्कृति और मूल्य भिन्न हैं? क्यों दिल्ली के बाद की घटनाओं को नकारा जा रहा है? एक ही सप्ताह में चार गैंग रेप! सामंतशाही भी शर्मसार हो जाएगी।
जनता भी और मीडिया भी अभी तक दिल्ली की ही घटना से उद्वेलित है। इन चारों का तो जैसे कोई मां-बाप ही नहीं है।  किसने मंुह बंद किया मीडिया का? कटनी के गैंगरेप का आरोपी तो एक भाजपा नेता का बेटा था। क्या इनको रोजमर्रा की साधारण घटना मानकर छोड़ देना चाहिए? छत्तीसगढ़ में तो महिला पुलिस अघिकारी का यौन शोष्ाण प्रमाणित होने के बाद भी पुलिस ने सेना के अघिकारी को ही बचाया। लगता है कि इनमें से किसी घर में बहन-बेटियां नहीं हैं। एक तरफ ‘बेटी बचाओ’ और दूसरी ओर ‘बेटी को नोंच खाओ।’ डूब मरो!

गुलाब कोठारी (http://gulabkothari.wordpress.com/category/special-articles/)

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