भीतर झांकने की कला आनी चाहिए

किसी व्यवस्था के शीर्ष पद पर या किसी संस्थान में जिम्मेदारी का कार्य करते हुए एक दायित्व बड़ी सावधानी से निभाना होता है और वह है लोगों पर नजर रखना। दो बातों पर निगाह रखी जाती है। पहली, लोग गलत काम न कर पाएं और दूसरा, वे अच्छे काम करें। कई बार प्रमुख लोग अधिक ऊर्जा लोगों की गलतियां पकडऩे में लगाते हैं। धीरे-धीरे ये आदत बन जाती है और फिर प्रताडि़त करने और दंड देने में मजा आने लगता है। लिहाजा कई बार तो गलती करने का मौका दिया जाता है और बाद में पोस्टमार्टम होता है, जबकि होना यह चाहिए कि ऑपरेशन कर दिया जाए ताकि पोस्टमार्टम की नौबत ही न आए। गलतियां ढूंढ़कर अपमानित करना लंबे समय तक चलता रहे तो कुल मिलाकर काम का नुकसान होता है और लोगों में सुधरने की संभावना खत्म हो जाती है। इसलिए किसी के भी भीतर झांकने की कला आनी चाहिए। गलती करते हुए व्यक्ति को केवल ऊपर से मत देखिए, थोड़ा-सा भीतर जाकर पकडि़ए कि आखिर दोष का मूल कहां है? वो कौन-सी जड़ है, जो पेड़ को बाहर से सुखा रही है? किसी के भी भीतर तब झांका जा सकता है, जब हमारी अपने भीतर देखने की तैयारी हो। आज के दौर में हम क्या नहीं देख रहे, हथेली से चिपके हुए मोबाइल के परदे से सारी दुनिया देखी जा सकती है और लोग देख भी रहे हैं। लोग यह भूल रहे हैं कि दृश्य जितने अधिक होंगे, दृष्टि उतनी ही कमजोर होती जाएगी। कमजोर दृष्टि से आप अपने भीतर कभी नहीं झांक पाएंगे। इसलिए रोज थोड़ा अभ्यास करिए, खुद को निहारने का। अपनी निजता को जानने के लिए योग जरूर करिए।

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