सहनशीलता

सृष्टि के सृजन में सहनशीलता प्रमुख तत्व के रूप में दिखता है। धरती इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। धरती के सीने पर कितने आघात होते हैं, इसे अपवित्र किया जाता है, लेकिन यह बड़े उदात्त भाव से हमें खाद्यान्न, फल प्रदान करती रहती है, जीवनदायक जल का उत्सर्जन करती है, आधार प्रदान करती है। बदलते हुए मौसम भी इस बात का संदेश देते हैं कि हर परिस्थिति को स्वीकार करना चहिए, किंतु मनुष्य ने आदिकाल से ही इनसे कोई प्रेरणा नहीं ली है। पांच तत्व मनुष्य के शरीर की रचना में सहायक हैं और इन पांचों तत्वों में ही सहनशीलता का गुण है, फिर भी मनुष्य में सहनशीलता का अभाव आश्चर्य पैदा करता है। सभी पांच तत्व विपरीत स्वभाव के होने के बाद भी एक साथ रहकर सृजन करते हैं।
पंच तत्व एक साथ सामंजस्य बना सकते हैं, किंतु दो मनुष्यों के बीच सामंजस्य एक बड़ा सवाल होता है। तत्काल प्रतिक्रिया व्यक्त करना आवश्यकता से अधिक कथित बौद्धिकता का परिचायक बनता जा रहा है। अल्पज्ञान और स्वार्थपरता के चलते दी जाने वाली प्रतिक्रियाएं प्राय: अप्रिय स्थितियां ही उत्पन्न करती हैं। हम दिन भर में जितने भी शब्द और वाक्य बोलते हैं उनमें से दस प्रतिशत ही अर्थपूर्ण होते हैं और शेष के बिना भी काम चल सकता है। अधिक बोलना इस बात का प्रतीक होता है कि हम व्यक्तियों और परिस्थितियों को स्वीकार नहीं कर रहे हैं। वाद-विवाद से विकृतियां उपजती हैं। शाब्दिक प्रतिक्रिया ही वीभत्स होकर हिंसा, विघटन और विध्वंस का रूप लेती है। जो पंचतत्व हमारे शरीर की रचना में सक्रिय हैं जब हम उनकी सहनशीलता और सामंजस्य के स्वभाव को अपना लेते हैं तो तन और मन, दोनों एक ही सीध में, एक ही कक्षा में आकर हमारी क्षमता में वृद्धि करते हैं। संसार में जिसने भी सफलता पाई है उसके पीछे सहनशीलता का गुण रहा है। उग्र, असंयमित को जीवन में असफलता और निराशा ही हाथ लगी है।

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