Monthly Archives: June 2012

Mother

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खुला मन और बंद मन

दो  प्रकार के मन होते हैं-एक तो खुला मन और एक बंद मन। बंद मन वह है जो कहता है, ‘यह ऐसा ही होता है। मुझे मालूम है।’ खुला मन कहता है-‘हो सकता है। शायद मुझे मालूम न हो।’ सारी समस्याएं जानने से उठती हैं। जब भी तुम्हें लगता है कि तुम परिस्थिति को समझ रहे हो और उस पर लेबल लगाते हो, यही तुम्हारी समस्या की शुरु आत है। जब भी तुम्हें लगे कि तुम्हारे साथ अन्याय हुआ है तो यह ‘ऐसा ही होता है’ की श्रेणी में आते हैं। यह सीमित ज्ञान की उपज है लेकिन जब तुम में विस्मय, धीरज, आनंद हो; तब तुम ‘मुझे नहीं पता, ऐसा हो सकता है’,की स्थिति में हो। सारा जीवन उस सीमित ‘मुझे मालूम है’ से सभी तरह ही संभावनाओं तक का स्थानांतरण है। तुम्हें लगता है तुम्हें इस संसार के बारे में सब मालूम है और यही सब से बड़ी समस्या है। यही एक जगत नहीं है। इस जगत की कई परतें हैं। जब तुम परेशान होते हो, तब जैसे कोई डोर तुम्हें खींच रही होती है। जब कोई घटना घटती है, तब उस घटना के उस तरह होने की कई संभावनाएं हो सकतीं हैं। न केवल ठोस स्तर पर लेकिन किसी कारणवश सूक्ष्म स्तर पर भी। मानो तुम अपने कमरे में दाखिल हुए। पाया कि किसी ने सारा कमरा तितर-बितर कर डाला है। तुम उस व्यक्ति के प्रति क्रोध से जोड़ देते हो लेकिन सूक्ष्म स्तर पर कुछ और भी हो रहा है। सीमित ज्ञान के कारण ऐसा होता है। इसका अनुभव करने के बाद भी तुम उसके परे कुछ देख नहीं पाते। एक कहावत है, कुएं में गिरे दिन में और देखा रात में। इसका अर्थ है, तुम्हारी आंखें खुली नहीं हैं। आसपास उसे देखने और पहचानने के लिए तुम पर्याप्त रूप से संवेदनशील नहीं हो। जब तक हम घटनाओं और भावनाओं को व्यक्तियों के साथ जोड़ेंगे, ये चक्र चलता रहेगा। तुम उससे कभी मुक्त नहीं हो पाओगे। तो सबसे पहले उस घटना और भावना को उस व्यक्ति, उस स्थान और उस समय से अलग कर दो। ब्रह्माण्ड की एकात्मकता के ज्ञान को जानो। यदि तुम्हारे हाथ पर एक पिन चुभे तो सारे शरीर को महसूस होता है। इसी प्रकार, हर शरीर सृष्टि से, हरेक से जुड़ा है क्योंकि सूक्ष्म स्तर पर केवल एक जीवन है। यद्यपि ठोस स्तर पर ये भिन्न दिखाई पड़ते हैं। अस्तित्व एक है। दैवत्व एक है। जब तुम चेतना की निश्चितता जान जाते हो, तब तुम जगत की अनश्चितता से निश्चिंत रह सकते हो। प्राय: लोग इससे ठीक विरु द्ध करते हैं। वे अविसनीय पर विास करते हैं और व्यग्र हो जाते हैं। संसार परिवर्तन है, और आत्मा अपरिवर्तनशील है। तुम्हें अपरिवर्तनशील पर विास और परिवर्तन का स्वीकार करना है। यदि तुम निश्चित हो कि सब कुछ अनिश्चित है, तो तुम मुक्त हो। जब तुम अज्ञान में अनिश्चित हो, तुम चिंतित और तनावपूर्ण हो जाते हो। जागरूकतासहित अनिश्चितता उच्च स्तर का चैतन्य और मुस्कान देते हैं। अनश्चितता में कार्य करना जीवन को एक खेल, एक चुनौती बना देता है। अक्सर लोग सोचते हैं, निश्चितता मुक्ति है। जब तुम निश्चित न हो, तब यदि तुम्हें मुक्ति लगे, तभी वह सच्ची मुक्ति है

फिर स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं रह जाता |

ईश्वर ने हर एक को स्वतंत्रता प्रदान की है, अत: यदि कोई पुरुष भौतिक भोग करने का इच्छुक है और इसके लिए देवताओं से सुविधाएं चाहता है तो प्रत्येक हृदय में परमात्मा स्वरूप स्थित भगवान उसके मनोभावों को जानकर ऐसी सुविधाएं प्रदान करते हैं। कुछ लोग यह प्रश्न कर सकते हैं कि ईश्वर जीवों को ऐसी सुविधाएं प्रदान करके उन्हें माया के पाश में गिरने ही क्यों देते हैं? इसका उत्तर यह है कि यदि परमेश्वर उन्हें ऐसी सुविधाएं प्रदान न करें तो फिर स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं रह जाता। अत: वे सबों को पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करते हैं- चाहे कोई कुछ करे- किन्तु उनका अंतिम उपदेश हमें भगवद्गीता में प्राप्त होता है- मनुष्य को चाहिए कि अन्य सारे कायरे को त्यागकर उनकी शरण में आए। इससे मनुष्य सुखी रहेगा। जीवात्मा तथा देवता दोनों ही परमेश्वर की इच्छा के अधीन हैं। अत: जीवात्मा न तो स्वेच्छा से किसी देवता की पूजा कर सकता है, न ही देवता परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध कोई वर दे सकते हैं। सामान्यत: जो लोग इस संसार में पीड़ित हैं, वे देवताओं के पास जाते हैं, क्योंकि वेदों में ऐसा करने का उपदेश है कि अमुक-अमुक इच्छाओं वाले को अमुक-अमुक देवताओं की शरण में जाना चाहिए। चूंकि प्रत्येक जीव विशेष सुविधा चाहता है, अत: भगवान उसे विशेष देवता से उस वर को प्राप्त करने की प्रबल इच्छा की प्रेरणा देते हैं और उसे वर प्राप्त हो जाता है। जीवों में वह प्रेरणा देवता नहीं दे सकते, किन्तु भगवान परमात्मा हैं जो समस्त जीवों के हृदयों में उपस्थित रहते हैं, अत: कृष्ण मनुष्य को किसी देवता के पूजन की प्रेरणा प्रदान करते हैं। सारे देवता परमेश्वर के विराट शरीर के विभिन्न अंगस्वरूप हैं, अत: वे स्वतंत्र नहीं होते। वैदिक साहित्य में कथन है, ‘परमात्मा रूप में भगवान देवता के हृदय में भी स्थित रहते हैं, अत: वे देवता के माध्यम से जीव की इच्छा को पूरा करने की व्यवस्था करते हैं किन्तु जीव तथा देवता दोनों ही परमात्मा की इच्छा पर आश्रित हैं।

आईआईटी-सामंजस्यकारी और संतुलित

केंद्रीय इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिले की साझा एकल परीक्षा और आईआईटी की स्वायत्तता का हल निकल आने से बड़ी दुविधा दूर हो गई है। इसके लिए आम राय से जो नया फामरूला बना है, उसमें संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई) और शीर्ष संस्थानों की स्वायत्तता, दोनों का समावेश किया गया है। इसलिए यह सामंजस्यकारी और संतुलित लगता है। इसी से उम्मीद है कि इसके पक्षकारों में से एक एनआईटी भी चार जुलाई को होने वाली बैठक में अपनी मुहर लगा देगा। यह एक महीने से भी ज्यादा समय से चले आ रहे विवाद का लोकतांत्रिक तरीके से समापन होना माना जाएगा। इस विवाद के मूल में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल की वह महत्त्वाकांक्षी नीतियां हैं, जो शिक्षा-परीक्षा के क्षेत्र में बुनियादी बदलाव लाने के सरोकारों से जुड़ी हुई हैं। 10 वीं तथा 12 वीं की पढ़ाई और परीक्षा पद्धति में अपेक्षित सुधार के बाद इंजीनियरिंग-मेडिकल की बहुस्तरीय परीक्षाओं को नियंत्रित करना था। लेकिन छात्रों को सिर्फ जरूरी परीक्षाओं में बैठाने और उनका स्वरूप एकदेशीय करने की मंशा में शीर्ष संस्थानों की स्वाभाविक स्तरीयता के निर्वाह का ख्याल नहीं रखा गया। कानपुर और नई दिल्ली के भारतीय प्रौद्योगिक संस्थानों को जेईई का सरकारी नजरिया पांच दशकों में अर्जित उनकी विशिष्टता तथा स्वायत्तता पर हस्तक्षेप लगा। आज अगर भारतीय मेधा की विदेशों में पूछ है तो आईआईटी में दाखिले की विशिष्ट परीक्षा पद्धति, उनके शिक्षक और स्वायत्त संचालन व्यवस्था का इसमें बहुत बड़ा योगदान है। यह प्रतिष्ठा उन प्रक्रियाओं में समय के मुताबिक संशोधनों से बरकरार रह सकती है। इस पर अमल के बजाय आईआईटी को सर्वशिक्षा अभियान के डंडे से नहीं हांका जा सकता। शिक्षण क्षेत्र में भले इसे एक असमाजवादी दृष्टिकोण माना जाए लेकिन खास मेधा के साथ खास व्यवहार करना ही पड़ेगा। प्रधानमंत्री ने आईआईटी और उनके पूर्व छात्रों की मांगों पर सहमति जताते हुए सरकारी हस्तक्षेप न होने देने का उचित ही आश्वासन दिया था। नये फामरूले में पहली बार विभिन्न बोर्ड परीक्षाओं में छात्रों के हासिल अंकों को भी शामिल किया गया है। शीर्ष के 20 फीसद तक पर्सेटाइल वाले छात्रों को आईआईटी में दाखिले के काबिल माना जाएगा। इससे उनमें स्कूल स्तर पर भी बेहतर प्रदर्शन की जिजीविषा बनेगी। एआईईईई को इस बात से कोई लेना-देना नहीं था कि सफल छात्रों का प्रदर्शन स्कूलों में कैसा रहा है? श्रेणीबद्धता की रक्षा पर अड़े और इसे पाने में सफल रहे आईआईटी जेईई एडवांस की परीक्षा में उन खांचों को कैसे तोड़ पाएंगे जो 20 वीं सदी के अपेक्षाकृत तंग मॉडल बने हुए हैं, यह भी देखना है। 21 वीं सदी में बहुआयामी ढांचा बनाने की जरूरत है। अक्सर देखा गया है कि इन संस्थानों में दाखिला लेने वाले बहुत से छात्रों में इंजीनियरिंग की स्वाभाविक चाह नहीं होती। वे किसी न किसी दबाव में यहां चले आते हैं। कक्षाओं में अपने को असहज महसूस करते हैं जबकि यहां भी दाखिला वही गणित, भौतिकी और रसायन विषयों के लब्धांक के आधार पर होता है। यह कोचिंग संस्थानों के फलने-फूलने का रास्ता खुला छोड़ता है, जिसे नारायण मूर्ति ‘रट्टामार प्रतिभाओं के उत्पादक’ बताते हुए इंजीनियरिंग की स्वाभाविक मेधा की शिनाख्त में अड़ंगा बताते हैं। लिहाजा, परीक्षा के परंपरागत विषय और तरीके अंतरराष्ट्रीय मानकों की मांग करते हैं।

संसार में दो प्रकार के व्यक्ति हैं

संसार में दो प्रकार के व्यक्ति हैं-सापेक्ष जीवन जीने वाले और निरपेक्ष होकर जीने वाले। जो सापेक्ष होकर जीते हैं वे आलम्बन लेकर चलते हैं। सामान्यत: हर व्यक्ति को सहारे की अपेक्षा रहती है। बच्चा जब चलना शुरू करता है तो मां की अंगुली पकड़कर चलता है। व्यवसाय के क्षेत्र में प्रवेश करने वाला अनुभवी व्यक्तियों का सहारा खोजता है। विद्यार्थी अध्यापक का आलम्बन चाहता है। पर्याप्त क्षमता अर्जित होने के बाद सहारे की जरूरत नहीं होती। अक्षमता की स्थिति में अवस्था प्राप्त व्यक्ति सहारे की अपेक्षा अनुभव करता है। ध्यान के क्षेत्र में प्रविष्ट होने वाले साधक भी प्रारम्भ में निर्विकल्प ध्यान नहीं कर सकते। इसलिए ध्यान के लिए भी आलम्बन आवश्यक है। आलम्बन कौन नहीं लेता? जो व्यक्ति सक्षम होता है, संकल्प का धनी होता है, धृतिमान होता है। पुरुषार्थ में विास करता है और बचाव का उपाय नहीं खोजता, वह सहारे की प्रतीक्षा नहीं करता। थोड़ी सी साधन सामग्री से भी वह अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान कर देता है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के बारे में कहा जाता हैिवजेतव्या लंका चरणतरणीयो जलनिधि: विपक्ष: पौलस्त्यो रणभुवि सहायाश्च कपय:। तथाप्येको राम: सकलमवधीत् राक्षसकुलम् क्रियासिद्धि: सत्त्वे भवति महतां नोपकरणो।। लंका पर विजय पाने और समुद्र को लांघने का कठिन कार्य। सामने रावण जैसा शक्तिशाली दुश्मन। इधर युद्ध में सहायता करने वाले बन्दर। इस स्थिति में भी श्रीराम का मन प्रकम्पित नहीं हुआ। उनके विचारों की धरती पर सन्देह का पौधा नहीं उगा। वे चले, लंका पहुंचे और सम्पूर्ण राक्षस कुल को जीतकर सफल हो गये। महान पुरुषों की सफलता उपकरण सामग्री में नहीं, उनके सत्त्व में रहती है, प्रबल मनोबल में रहती है। संसार में जितने भी महान व्यक्तित्त्व हुए हैं, वे कभी साधन सामग्री के मोहताज नहीं बने। जो साधन उपलब्ध हुए उन्हीं के बल पर उन्होंने लक्ष्य तक पहुंचने में सफलता पायी। ध्यान के आचायरे और योग-साधकों ने निरालम्बन एवं सालम्बन-दोनों प्रकार की योगसाधना को अपनी स्वीकृति दी है। जो लोग पहुंचे हुए होते हैं, परिपक्व होते हैं, वे निरालम्बन ध्यान का प्रयोग करते हैं। प्रारम्भ में आलम्बन बिना चित्त को ठहरने का स्थान नहीं मिलता। चित्त चंचल न हो, उसे पकड़ा जा सके, किसी एक बिन्दु पर केन्द्रित किया जा सके, इस दृष्टि से अनेक आलम्बन बताये गये हैं। रूपस्थ, पदस्थ आदि ध्यान की प्रक्रियाओं में आकृतियों और मंत्रों का आलम्बन लिया जाता है। – ‘जब जागे तभी सबेरा से’

गंदे पानी के उपयोग को सार्थक किया

सामान्य तौर से गंदगी पानी की आक्सीजन छीन लेती है। गंदे पानी को वैज्ञानिक तरीके से शोधित कर उपयोग किया जाये तो आश्चर्यजनक नतीजे हासिल हो सकते हैं। इसके लिए जरूरी है कि शोध, अध्ययन और वैज्ञानिकों की राय पर अमल किया जाये। विशेषज्ञों की मानें तो कूड़ा भी बेकार नहीं होता। कूड़े को नया आकार-आयाम देकर उसका बेहतर उपयोग किया जा सकता है। गत दिनों चण्डीगढ़ के वरिष्ठ नागरिक ने कूड़े से उपयोगी वस्तुएं निकालकर एक पार्क को बड़े बेहतर ढंग से सजाया था। कूड़ा-कचरा व करकट का बेहतर उपयोग करने की आवश्यकता है। महानगरों में गाब्रेज (कूड़ा) डम्पिंग ग्राउण्ड की समस्या तेजी से बढ़ रही है। शहरों से जुड़े हाईवे के किनारे कूड़ा-कचरे के पहाड़ शहर के सौन्दर्य को नष्ट कर रहे हैं। कई जगह सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट के तहत कूड़े से खाद बनाने से लेकर बिजली तक की परियोजनाओं पर काम हो रहा है। जाहिर है कि गंदगी का भी जनहित में बेहतर उपयोग किया जा सकता है। बात चाहे कूड़े की हो, या फिर संड़ाध भरे पानी की, वैज्ञानिक तरीका अपनाकर उसका बेहतर उपयोग किया जा सकता। अमेरिका के शोधकर्ताओं व वैज्ञानिकों ने हाल ही में मल-मूत्र व अन्य गंदे पानी के उपयोग को सार्थक किया है। नाला-नालियों, पोखरों व नदियों में अरबों गैलन बह जाने वाले गंदे व बदबूदार पानी का उपयोग ऊर्जा उत्पादन में किया जा रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि साफ सुथरे पानी की तुलना में गंदे पानी से 20 प्रतिशत अधिक ऊर्जा का उत्पादन किया जा सकता है। सीवर के पानी का सर्वाधिक उपयोग अमेरिका में करके बिजली बनायी जा रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक अमेरिका में हर साल औसतन 14 ट्रिलियन गैलन गंदे पानी का उपयोग ऊर्जा बनाने के लिए किया जा रहा है। अमेरिकी शोधकर्ता एलिजाबेथ एस. हैड्रिक कहती हैं ‘गंदे पानी का उपयोग ऊर्जा बनाने में बेहतर साबित हुआ है।’ अमेरिका में बिजली की कुल खपत में करीब डेढ़ प्रतिशत सीवर व अन्य गंदे पानी से बन रही बिजली से पूर्त की जा रही है। शोध व अध्ययन केातीजे बताते हैं, एक गैलन गंदे व बेकार पानी से पांच मिनट तक सौ वॉट का बल्ब आसानी से जलाया जा सकता है। इतना ही नहीं, सीवरेज व गंदे पानी में मौजूद कार्बनिक अणुओं को ईधन में भी बदला जा सकता है जिसका उपयोग अन्य कई क्षेत्रों में किया जा सकता है। यह शोध देश दुनिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। आज भी अरबों गैलन सीवरेज व अन्य गंदा पानी नाला-नालियों, तालाबों व नदियों में बहाया जाता है क्योंकि इसे व्यर्थ समझा जाता है। गंदे जल के शुद्धीकरण में वैज्ञानिक तकनीक का उपयोग होने से नदियों का प्रदूषण भी काफी हद तक कम हो सकता है। साथ ही पर्यावरण संरक्षण को बल मिलेगा। इसके लिए सरकार, सामाजिक संस्थाओं व वैज्ञानिकों को सार्थक पहल करनी होगी ताकि घरेलू गंदे पानी का उपयोग बिजली बनाने व अन्य उपयोग के लिए किया जा सके। अपने देश में केवल दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार व पश्चिम बंगाल को ही देखें तो अरबों गैलन सीवरेज हर दिन सीधे गंगा व यमुना नदियों में गिरता है जिससे इन नदियों का प्रदूषण लगातार बढ़ता जा रहा है। गंदे जल का शोधन किया जाये तो गंगा-यमुना जैसी नदियों का प्रदूषण ता रोका ही जा सकता है, इससे अरबों की धनराशि बचेगी।

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गुम हुए नेताजी

विजय पाण्डेय 

आजाद हिन्द फौज के जरिए अंग्रेजों की नाक में दम कर देने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत का सच आज भी सामने नहीं आ पाया है और यह रहस्य साधु-संन्यासियों के मिथकों तथा गोपनीय फाइलों में गुम हो गया है।बता रहे है विजय पाण्डेय ……….
 कहा जाता है कि 18 अगस्त 1945 को ताइवान के ऊपर हुए एक विमान हादसे में भारत के इस महान सपूत की मौत हो गई थी लेकिन इस कहानी पर बहुत से सवालिया निशान है। मिशन नेताजी से जुड़े अनुज धर ने जब सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत सरकार से नेताजी की कथित मौत से संबंधित फाइल मांगी तो इसे देने से इंकार कर दिया गया। नेताजी के रहस्य पर पुस्तक लिख चुके अनुज धर का मानना है कि 18 अगस्त 1945 को ताइवान के ऊपर विमान हादसे और उसमें नेताजी की मौत की कहानी मनगढ़ंत है तथा ऐसा कोई सबूत नहीं है जो इसकी पुष्टि करता हो। उनका आरोप है कि नेताजी की मौत का सच जानबूझकर छिपाया जा रहा है। आजाद हिन्द फौज में शामिल रहे बहुत से सैनिक और अधिकारी दावा कर चुके है कि विमान हादसे में नेताजी की मौत नहीं हुई थी और वह आजादी के बाद भी जीवित रहे। उनका कहना है कि सुभाष चंद्र बोस आजादी के बाद देश में जन्मी घटिया राजनीति की वजह से सामने नहीं आ पाए और उन्होंने गुमनामी का जीवन जीना ही श्रेष्ठ समझा। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की कथित मौत की जांच के लिए बनाई गई शाहनवाज समिति ने जहां विमान हादसे की बात को सच बताया था, वहीं इस समिति में शामिल नेताजी सुभाष चंद्र के बड़े भाई सुरेश चंद्र बोस ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया था और कहा था कि विमान हादसे की घटना को जानबूझकर सच बताने की कोशिश की जा रही है। 1999 में गठित मुखर्जी आयोग ने 18 अगस्त 1945 को विमान हादसे में नेताजी की मौत को खारिज कर दिया तथा कहा कि इस मामले में आगे और जांच की जरूरत है। आयोग ने आठ नवम्बर 2005 को अपनी रिपोर्ट भारत सरकार को सौपी थी। 17 मई 2006 को इसे संसद में पेश किया गया जिसे सरकार ने मानने से इंकार कर दिया ।

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विजय पाण्डेय 
विनायक नर्सरी (VINAYAK NURSERY), जयपुर 
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