आरक्षण का बंटवारा—- दबे पांव

A.K.Pandey

देश में आजकल मानों सांप सूंघा हुआ है। केन्द्र सरकार, राज्य सरकारें और देश के विभिन्न उच्च न्यायालय, उच्चतम न्यायालय अपनी-अपनी भाषा में आरक्षण के मुद्दे पर कुछ न कुछ कह रहे हैं। एक ओर मूल आरक्षण का मुद्दा भी रस्साकसी का विषय बना हुआ है। एक लम्बी सूची है जातियों की, जो आरक्षण का लाभ प्राप्त करना चाहती हैं। दूसरी ओर उच्चतम न्यायालय का फैसला पचास प्रतिशत से अधिक पर रोक लगा रहा है। हर प्रदेश में यह प्रतिशत भी अलग-अलग है। एक जाति भिन्न-भिन्न प्रदेशों में भिन्न-भिन्न दर्जा प्राप्त है।

अब पदोन्नति में आरक्षण का मुद्दा नए स्वरूप में उभरकर आ रहा है। सरकारें भी विचलित हैं और न्याय पाने वाले भी। चूंकि आरक्षण का आधार गरीबी न होकर जातियां हैं, अत: जातियों के बीच परम्परागत वैमनस्यता भी अपनी भूमिका निभा रही है। जातियों के इतिहास ने नई भूमिका पैदा कर दी कि अमुक जाति 1500 वर्षो से है या 4000 वर्षो से।
किसी भी एक जाति का नाम सूची में जोड़ते ही एक प्रश्न उठ जाता है कि इस जाति से कमजोर मान लें कि बीस जातियां और हंै, तब उनका नाम क्यों नहीं जुड़ना चाहिए? के न्द्र सरकार के पास नवीं सूची में जोड़ने के लिए जातियों की लम्बी सूची तैयार हो गई है। किन्तु इनको आरक्षण कहां से दिया जाए।
पचास प्रतिशत के बाद उच्चतम न्यायालय नहीं छोड़ेगा। जिनको पहले जितना मिल चुका है, वे कम करने को राजी क्यों होंगे। खैर यह लड़ाई आंकड़ो की है, कानून की है और सरकारों के लिए मनोरंजन मात्र है। उनको न लोगों से मतलब, न जातियों के हानि-लाभ से मतलब। उनके लिए तो बस वोट ही एकमात्र आधार है। अब यह कहा नहीं जा सकता कि यह कार्ड भी कितने साल काम आएगा। नई पीढ़ी जागरूक है और प्रतिक्रियावादी भी। जैसे कांग्रेस का मुस्लिम कार्ड फेल हो गया, भाजपा का हिन्दू कार्ड बदरंग हो गया, वैसे ही आरक्षण का कार्ड भी लम्बा चलने वाला नहीं है। भले ही हमारे नेताओं ने इसे दस वर्ष से बढ़ाकर साठ वर्ष पहुंचा दिया होगा। आगे मार्ग कठिन है। राजनेता यदि नहीं भी मानेंगे, तो नई पीढ़ी मनवा देगी। कैसे भले लोग थे जो इसे यहां तक ले आए! कैसे भले लोगों ने नाप-तौलकर देश को बराबर के दो भागों में बांट दिया। सन् 1947 के बंटवारे में तो ऎसे लोग नहीं थे। जो अलग होने को सहमत थे, अलग हो गए। हम हमारे घर में, वो उनके घर में। जिस तरह के देश विरोधी नारे लगते थे, अब ठंडे पड़ गए। किन्तु इस देश में आरक्षण का जो बंटवारा जानबूझकर किया गया है, उसके नारों की गूंज कई पीढियों तक रहेगी। दो धडे तो देश के हो चुके हैं, किन्तु पाकिस्तान की तरह अलग-अलग नहीं रह रहे। साथ-साथ रह रहे हैं। एक ही गांव, एक ही मोहल्ले में रह रहे हैं। एक-दूसरे को प्रतिक्षण नुकसान करने पर तुलेे हुए हैं। यह साथ जीने वालों की शैली नहीं है। बाहर के शत्रु से लड़ा जा सकता है, भितरघात से बच पाना कठिन है। इस वातावरण के रहते किसी अन्य शत्रु की देश को आवश्यकता ही नहीं है। एक वातावरण विशेष से मुक्ति दिलाने के लिए आरक्षण की सुविधा संविधान निर्माताओं ने दी थी। साठ साल में हम देश का स्पष्ट विभाजन देख रहे हैं।
आज हम किसी भी पाकिस्तानी के साथ कुछ समय रह सकते हैं, किन्तु आरक्षित और गैर आरक्षित वर्ग साथ नहीं रह सकता। ऊपर से भले कुछ भी दिखाई दे, पिछले सालों की फाइलों का इस दृष्टि से आकलन करें, सरकार में दोनों धड़ों की भूमिका देखें, समाज व्यवस्था में जो बदलाव आया है वह सब एक ही संदेश देते हैं- “आरक्षण ने देश के दो टुकड़े कर दिए, कानून सम्मत 50-50।” ये कभी सौहाद्रüपूर्ण ढंग से साथ नहीं रहेंगे। आने वाली पीढियों में आरक्षित वर्ग द्वितीय श्रेणी का नागरिक होकर अल्पसंख्यकों की तरह मुख्य धारा से बाहर हो जाएगा।
सरकार के बाहर, सामाजिक परिदृश्य में, दूरियां बढ़ने लग गई हैं, बढ़ती ही जाएगी। आरक्षित वर्ग शनै:-शनै: अपने समुदायों में सिमटकर अधिक असुरक्षित होते रहेंगे। तब यह वोट मांगने वाला कहीं दिखाई नहीं देगा। दोनों वर्ग एक-दूसरे को आगे बढ़ने से रोकते रहेंगे। आपस में गाली-गलौज तो चालू आहे। तब देश हमारे हाथ में कैसे सुरक्षित रह पाएगा? सरकारें तो विदेशियों को बुला-बुलाकर आज भी बेचने में कसर नहीं छोड़ रहीं। रोके कौन? इसका एक ही उत्तर है- समान नागरिकता, समान अवसर, समान अधिकार। देश नहीं झेल पाएगा आरक्षण की मार।

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