Monthly Archives: May 2012

तेरी औकात भी है मेरी तरफ देखने की?

दानदाता ने एक रूपए का सिक्का फेंका तो वह बजाए भिखारी के डिब्बे में गिरने के सड़क पर जा गिरा। भिखारी ने दानदाता को दुआएं देते हुए सिक्का उठाकर डिब्बे में डाल लिया। तभी कहीं से हंसने की आवाज आई, खिलखिलाकर हंसने की! एक रूपए के सिक्के ने क्रोध से चौंककर आसपास देखा तो उसे पास की दुकान के शानदार शो-केस में रखा पांच सौ रूपए का नोट दिखा, खिलखिलाकर हंसता हुआ!  ‘गुस्से से क्या देख रहा है।’ पांच सौ रूपए का नोट गर्वोक्ति से बोला ‘तेरी औकात भी है मेरी तरफ देखने की? और जहां तक हंसने का सवाल है तो भिखारी को दी जाने वाली चीज सड़क पर गिर जाए तो हंसी आ ही जाती है।’
‘कोई बात नहीं, हंस लो, खूब हंस लो’ एक रूपए के सिक्के ने शांति से जवाब दिया ‘पर जरा बाद में अपने बारे में भी सोच लेना। हमें पाकर भिखारी दाता को दुआएं ही देता है। हमें या दाता को शक की नजर से नहीं देखता, हमारी असलियत नहीं परखता।’

खाली सीट को फिर से तलाशने लगी थीं उसकी बूढ़ी निगाहें।

स्टैण्ड पर बस के आते ही सवारियों के साथ मैं भी उसमें चढ़ने की कोशिश करने लगा। बड़ी जद्दोजहद के बाद आखिर बस में चढ़ पाने में कामयाब हो गया। मगर थोड़ी देर में भीष्ाण गर्मी के मारे भीड़ में दम घुटने लगा था। मेरे समीप ही एक ग्रामीण वृद्ध खड़ा था।  हाथ में गन्ने के 10-15 टुकड़ों का एक गटर लिए था।
उसका चेहरा उसकी दास्तां कह रहा था। वह रह रहकर बेचैनी-सी महसूस कर रहा था। सांसें भी कुछ लम्बी खींच रहा था। बस में खासी भीड़ थी क्योंकि बस काफी समय के बाद आई थी। खाली सीट पाने के लिए उसकी निगाहें थम गई। एक सीट को खाली देखते हुए उस पर उसे बैठने का इशारा करते हुए कहा-बाबा इस सीट पर बैठ जाओ। 
इतने में दूसरी सवारी ने कहा यह हमारी सीट है, साथ वाले नीचे गए हैं। यह सुनकर वह वृद्ध बेबस, विवश, असहाय-सा होकर खड़ा रहा। अब बस रफ्तार तेज करते हुए उबड़ खाबड़ रास्ते पर दौड़ने लगी थी। मगर उस युवक की बगलवाली सीट अब भी खाली थी। यह देखकर वृद्ध ने पुन: बैठने की चेष्टा ही की थी कि उस युवक ने पीछे खड़ी एक नवयौवना को आकर बैठने का इशारा किया। यह देखकर धीरे से मुंह पिचकाकर ग्रामीण वृद्ध कुछ बुदबुदाने लगा और पुन: किसी खाली सीट को फिर से तलाशने लगी थीं उसकी बूढ़ी निगाहें।

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फेसबुक के आईपीओ पर निवेशकों की पैनी नजर है।

 फेसबुक के आईपीओ पर निवेशकों की पैनी नजर है। कंपनी इस आईपीओ के जरिए 5600 अरब रुपये की मालिक बनने जा रही है। आईपीओ प्लानिंग से लेकर इसे बाजार में लाने तक के लिए काफी मेहनत भी की गई है, लेकिन क्या आपको पता है कि फेसबुक आईपीओ का मास्टर माइंड कौन है? इसके पीछे दिमाग किसका है? आईपीओ की प्लानिंग किसने की? किसने फेसबुक को वित्तीय मजबूती दी? इन सबका जवाब अधिकतर लोग मार्क जुकरबर्ग ही देंगे। अगर आपका जवाब भी यही है, तो आप बिल्कुल गलत हैं। जी हां, मार्क जुकरबर्ग से ज्यादा इस काम को अंजाम फेसबुक के मुख्य वित्त अधिकारी (सीएफओ) ने दिया है।
42 साल के डेविड इंबरसमैन ही फेसबुक आईपीओ के चीफ मास्टर माइंड हैं। स्वभाव से काफी शांत इंबरसमैन पर्दे के पीछे के खिलाड़ी है। फेसबुक से पहले इन्होंने 2009 में जेंटैक की पूरी हिस्सेदारी दिलाने में भी अपनी पुरानी कंपनी आरएचएचबीवाई में अहम रोल निभाया था। इंबरसमैन के एक सहयोगी कर्मचारी मार्क भी उन्हें वॉल स्ट्रीट का जानकार मानते हैं।
फेसबुक में आने के बाद से इंबरसमैन कंपनी को वित्तीय मजबूत करने में लगे हुए थे। कुछ लोगों की टीम के साथ मल्टीईयर बजट तैयार किया गया था। इसे फाइनेंस की टीम ने हैक कर लिया था। उसके बाद भी इंबरसमैन ने हार नहीं मानी। इसे अंतिम रूप देने के लिए कई महीने लगे। इंबरसमैन को कई स्तर पर इस बजट को बनाने में मुश्किल का सामना भी करना पड़ा था।
जानकारों का मानना है कि फेसबुक को पब्लिक मार्केट में लाना बिल्कुल आसान काम नहीं था। कंपनी के खर्चो में पिछले 1-2 साल में 70-75 फीसदी तक का इजाफा हुआ है। वहीं रिस्क फैक्टर भी बढ़ा है। इन सबके बावजूद इंबरसमैन ने इसे मुमकिन कर दिखाया।
इंबरसमैन ने गुडविल पाने के लिए कंपनी की बाकी गतिविधियों में भी हिस्सा लेना चालू कर दिया था। उन्होंने फेसबुक की टॉप 40 इन हाउस ब्रांड फीडबॉम्ब को ज्वाइन कर लिया। इससे भी कंपनी के कर्मचारियों को जानने और वित्तीय जरूरतों को समझने में इंबरसमैन को काफी मदद मिली।
दिलचस्प है कि फेसबुक ने अपने आईपीओ का प्राइस बैंड 34-38 डॉलर तक रखा है। पहले कंपनी ने अपने आईपीओ के लिए 28-35 डॉलर का प्राइस बैंड निर्धारित किया था। प्राइस बैंड के अधिकतम स्तर यानी 38 डॉलर के हिसाब से अगर फेसबुक की कीमत आंकी जाए तो कीमत बैठती है करीब 104 बिलियन डॉलर यानी पांच लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा।
कंपनी अभी पूरे शेयर नहीं बेच रही है। अभी जितने शेयर बेच रही है उससे कंपनी को करीब 12 बिलियन डॉलर यानी 60 हजार करोड़ रुपये मिलेंगे। कंपनी 33 करोड़ शेयरों की जगह अब करीब 42 करोड़ शेयर बेचेगी। फेसबुक के सीईओ मार्क जकरबर्ग तो कंपनी में अपनी हिस्सेदारी नहीं बेचेंगे लेकिन सिलिकॉन वैली के बड़े उद्योगपति पीटर थील 16 करोड़ शेयर बेचेंगे। गोल्डमैन सैश ने भी करीब 28 करोड़ शेयर बेचने का फैसला किया है। हेज फंड टाइगर ग्लोबल 23 करोड़ शेयर बेचेगा।

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लोगों की नौटंकी और बहकावे पर मत जाओ… और…. "गर्व से कहो हम हिन्दू हैं"

Siddharth Singh

हिन्दुत्व को प्राचीन काल में सनातन धर्म कहा जाता था। हिन्दुओं के धर्म के मूल तत्त्व सत्य, अहिंसा, दया, क्षमा, दान आदि हैं जिनका शाश्वत महत्त्व है। अन्य प्रमुख धर्मों के उदय के पूर्व इन सिद्धान्तों को प्रतिपादित कर दिया गया था। VMW Team के सिद्धार्थ सिंह श्रीनेत की एक पेशकश …..
 इस प्रकार हिन्दुत्व सनातन धर्म के रूप में सभी धर्मों का मूलाधार है क्योंकि सभी धर्म-सिद्धान्तों के सार्वभौम आध्यात्मिक सत्य के विभिन्न पहलुओं का इसमें पहले से ही समावेश कर लिया गया था। मान्य ज्ञान जिसे विज्ञान कहा जाता है प्रत्येक वस्तु या विचार का गहन मूल्यांकन कर रहा है और इस प्रक्रिया में अनेक विश्वास, मत, आस्था और सिद्धान्त धराशायी हो रहे हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आघातों से हिन्दुत्व को भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इसके मौलिक सिद्धान्तों का तार्किक आधार तथा शाश्वत प्रभाव है।
आर्य समाज जैसे कुछ संगठनों ने हिन्दुत्व को आर्य धर्म कहा है और वे चाहते हैं कि हिन्दुओं को आर्य कहा जाय। वस्तुत: ‘आर्य’ शब्द किसी प्रजाति का द्योतक नहीं है। इसका अर्थ केवल श्रेष्ठ है और बौद्ध धर्म के चार आर्य सत्य की व्याख्या करते समय भी यही अर्थ ग्रहण किया गया है। इस प्रकार आर्य धर्म का अर्थ उदात्त अथवा श्रेष्ठ समाज का धर्म ही होता है। प्राचीन भारत को आर्यावर्त भी कहा जाता था जिसका तात्पर्य श्रेष्ठ जनों के निवास की भूमि था। वस्तुत: प्राचीन संस्कृत और पालि ग्रन्थों में हिन्दू नाम कहीं भी नहीं मिलता। यह माना जाता है कि परस्य (ईरान) देश के निवासी ‘सिन्धु’ नदी को ‘हिन्दु’ कहते थे क्योंकि वे ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ करते थे। धीरे-धीरे वे सिन्धु पार के निवासियों को हिन्दू कहने लगे। भारत से बाहर ‘हिन्दू’ शब्द का उल्लेख ‘अवेस्ता’ में मिलता है। विनोबा जी के अनुसार हिन्दू का मुख्य लक्षण उसकी अहिंसा-प्रियता है
हिंसया दूयते चित्तं तेन हिन्दुरितीरित:।
एक अन्य श्लोक में कहा गया है
ॐकार मूलमंत्राढ्य: पुनर्जन्म दृढ़ाशय:
गोभक्तो भारतगुरु: हिन्दुर्हिंसनदूषक:।
ॐकार जिसका मूलमंत्र है, पुनर्जन्म में जिसकी दृढ़ आस्था है, भारत ने जिसका प्रवर्तन किया है, तथा हिंसा की जो निन्दा करता है, वह हिन्दू है।
चीनी यात्री हुएनसाग् के समय में हिन्दू शब्द प्रचलित था। यह माना जा सकता है कि हिन्दू’ शब्द इन्दु’ जो चन्द्रमा का पर्यायवाची है से बना है। चीन में भी इन्दु’ को इन्तु’ कहा जाता है। भारतीय ज्योतिष में चन्द्रमा को बहुत महत्त्व देते हैं। राशि का निर्धारण चन्द्रमा के आधार पर ही होता है। चन्द्रमास के आधार पर तिथियों और पर्वों की गणना होती है। अत: चीन के लोग भारतीयों को ‘इन्तु’ या ‘हिन्दु’ कहने लगे। मुस्लिम आक्रमण के पूर्व ही ‘हिन्दू’ शब्द के प्रचलित होने से यह स्पष्ट है कि यह नाम मुसलमानों की देन नहीं है।
भारत भूमि में अनेक ऋषि, सन्त और द्रष्टा उत्पन्न हुए हैं। उनके द्वारा प्रकट किये गये विचार जीवन के सभी पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं। कभी उनके विचार एक दूसरे के पूरक होते हैं और कभी परस्पर विरोधी। हिन्दुत्व एक उद्विकासी व्यवस्था है जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता रही है। इसे समझने के लिए हम किसी एक ऋषि या द्रष्टा अथवा किसी एक पुस्तक पर निर्भर नहीं रह सकते। यहाँ विचारों, दृष्टिकोणों और मार्गों में विविधता है किन्तु नदियों की गति की तरह इनमें निरन्तरता है तथा समुद्र में मिलने की उत्कण्ठा की तरह आनन्द और मोक्ष का परम लक्ष्य है।
हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति अथवा जीवन दर्शन है जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को परम लक्ष्य मानकर व्यक्ति या समाज को नैतिक, भौतिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के अवसर प्रदान करता है। हिन्दू समाज किसी एक भगवान की पूजा नहीं करता, किसी एक मत का अनुयायी नहीं हैं, किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रतिपादित या किसी एक पुस्तक में संकलित विचारों या मान्यताओं से बँधा हुआ नहीं है। वह किसी एक दार्शनिक विचारधारा को नहीं मानता, किसी एक प्रकार की मजहबी पूजा पद्धति या रीति-रिवाज को नहीं मानता। वह किसी मजहब या सम्प्रदाय की परम्पराओं की संतुष्टि नहीं करता है। आज हम जिस संस्कृति को हिन्दू संस्कृति के रूप में जानते हैं और जिसे भारतीय या भारतीय मूल के लोग सनातन धर्म या शाश्वत नियम कहते हैं वह उस मजहब से बड़ा सिद्धान्त है जिसे पश्चिम के लोग समझते हैं । कोई किसी भगवान में विश्वास करे या किसी ईश्वर में विश्वास नहीं करे फिर भी वह हिन्दू है। यह एक जीवन पद्धति है; यह मस्तिष्क की एक दशा है। हिन्दुत्व एक दर्शन है जो मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं के अतिरिक्त उसकी मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक आवश्यकता की भी पूर्ति करता है।
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 सिद्धार्थ सिंह श्रीनेत,राजस्थान 
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नेहरू युवा केन्द्र————ग्रामीण युवाओं को स्वावलंबी बनाने के लिए भारत सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाएं दम तोड़ रही हैं।

  ग्रामीण युवाओं को स्वावलंबी बनाने के लिए भारत सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाएं दम तोड़ रही हैं। योजनाओं का क्रियान्वयन अधिकांश तौर पर फाइलों में ही हो रहा है, इसकी शिकायतें लगातार मिल रही हैं। इन्हीं योजनाओं का संचालन नेहरू युवा केन्द्र भी करता है। प्रदेश के सभी जिलों में केन्द्र खोले गए हैं। इनके कार्यो की पारदर्शिता जानने के लिए जन सूचना अधिकार अधिनियम-2005 के तहत सूचना मांगी गयी है।

नगर पालिका परिषद सिद्धार्थनगर के सिसहनिया निवासी राधेश्याम ने जन सूचना अधिकारी नेहरू युवा केन्द्र से जो सूचनाएं मांगी हैं, उसमें आठ बिन्दु शामिल हैं। आवेदक ने यह जानकारी चाही है कि सिद्धार्थनगर में नेहरू युवा केन्द्र द्वारा कौन-कौन से कार्यक्रम विगत पांच वर्षो से संचालित किये जा रहे हैं। कार्यक्रमों के संचालन हेतु कितना धन प्राप्त हुआ।
प्रत्येक कार्यक्रम पर किस प्रकार का धन खर्च किया गया। प्रत्येक संचालित कार्यक्रम में कौन-कौन से लोग सम्मिलित थे। केन्द्र पर कितने पंजीकृत एवं अपंजीकृत मण्डल दर्ज हैं और उनका कार्य क्षेत्र कहां है। इसमें कौन-कौन लोग जुड़े हैं। विगत दस वर्षो के दौरान कितने लोगों को कितना वेतन या मानदेय दिया गया, वर्षवार नाम व पदनाम सहित व्योरा। दस वर्षो में केन्द्र समन्वयक द्वारा कितना वेतन प्राप्त किया गया है।
सूचना में नेहरू युवा केन्द्र समन्वयक के चल-अचल संपत्ति का व्योरा भी मांगा गया है। सूचना में निर्धारित पोस्टल शुल्क की कापी लगाते हुए जरिए रजिस्ट्री विभाग को भेजा गया है।
सूचना मांगने वाले राधेश्याम का कहना है कि मेरे मोबाइल फोन नम्बर पर विभाग के एक व्यक्ति द्वारा सूचना के व्योरा का फोटो कापी देने के लिए दस रुपए प्रति पेज शुल्क मांगा जा रहा है, जबकि सूचना अधिकार अधिनियम में तीस दिन के भीतर सूचना देने पर दो रुपये प्रति पेज देय होता है। मैं निर्धारित शुल्क विभाग को देने के लिए तैयार हूं। निर्धारित समय तक सूचना न देने पर स्वयं के खर्च पर विभाग को सारी सूचनाओं की प्रति उपलब्ध कराने का अधिनियम में प्रावधान

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