ब्रह्म समाज ……………………………………….. राजा राम मोहन राय

VMW Team

ब्रह्म समाज, राजा राम मोहन राय द्वारा स्थापित हिन्दू सुधार आन्दोलन था। ब्रह्मसमाज उस आध्यात्मिक आंदोलन की कहानी है जो 19वीं शताब्दी के नवजाग्रत भारत की विशेषता थी। इस आंदोलन ने स्वतंत्रता की सर्वव्यापी भावना का सूत्रपात किया एवं जनसाधारण के बौद्धिक, सामाजिक तथा धार्मिक जीवन को नवीन रूप प्रदान किया। वस्तुत: ब्रह्मसमाज के विश्वासों एवं सिद्धांतों ने न केवल विगत वर्षों में भारतीय विचारधारा को ही नवीन मोड़ दिया, अपितु भारतीय राष्ट्रीय एकीकरण, अंतरराष्ट्रीयता एवं मानवता के उदय की भी अभिवृद्धि की।
18वीं शती के अंत में भारत पाश्चात्य प्रभावों एवं राष्ट्रीय रूढ़िवादिता के चतुष्पथ पर खड़ा था। शक्तियों के इस संघर्ष के फलस्वरूप एक नवीन गतिशीलता का उदय हुआ जो सुधार के उस युग का प्रतीक थी जिसका शुभारंभ पथान्वेषक एवं भारतीय नवजाग्रति के प्रथम अग्रदूत राजा राममोहन राय के आगमन के साथ हुआ। राजा राममोहन राय ने ईश्वरीय ऐक्य “एकमेवाद्वितीयम्” परमात्मा के पितृमयत्व एवं तज्जन्य मानवमात्र के भ्रातृत्व का संदेश दिया। इस सुदृढ़ तथा विस्तृत आधार पर ब्रह्मसमाज के सर्वव्यापी धर्म के उत्कृष्ट भवन का निर्माण हुआ। राममोहन राय का जन्म पश्चिम बंगाल के राधानगर ग्राम में 22 मई, 1772 ई. को हुआ था। उनके पिता रमाकांत राय संभ्रांत ब्राह्मण थे। इसलामी एवं हिंदू धर्मग्रंथों के मूलरूप में अध्ययन के फलस्वरूप राममोहन राय ने मूर्तिपूजा का परित्याग कर एकेश्वरवाद स्वीकार किया। जन्मजात सत्यान्वेषक होने के नाते उन्होंने लगभग तीन वर्ष सुदूर तिब्बत में बौद्धधर्म के परिज्ञानार्थ व्यतीत किए। ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा में रहकर राममोहन राय ने ईसाई धर्म का अध्ययन किया तथा आँग्ल मनीषियों से उनका संपर्क हुआ। राममोहन राय की प्रथम पुस्तक “तुहफ़तुल मुहावदीन” (एकेश्वर वादियों के लिए एक उपहार) ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि एक ईश्वर में विश्वास सभी धर्मों का सार है। उन्होंने हिंदू एवं ईसाई उभय रूढ़िवादिता के विरुद्ध सफल संघर्ष किया। राममोहन राय के अनन्य जीवन का सर्वोपरि कार्य था 23 जनवरी, (माघ 11), 1830 को ब्रह्मसमाज की स्थापना, सगुण ब्रह्म की उपासना का प्रथम सर्वोपरि मंदिर। यहीं से नवीन धार्मिक आंदोलन का जन्म होता है। राममोहन राय का स्वर्गवास 27 सितंबर, 1833 को ब्रिस्टल, इंग्लैंड में हुआ जहाँ वे सामाजिक तथा राजनीतिक उद्देश्य से गए थे। राममोहन राय द्वारा प्रवर्तित एकमेवाद्वितीय ब्रह्म की जाति, धर्म तथा निरपेक्ष उपासना ने प्रिंस द्वारिकानाथ के आत्मज महर्षि देवेंद्रनाथ ठाकुर (1817-1905) पर अति गंभीर प्रभाव डाला। देवेंद्रनाथ ने ही ब्रह्मसमाज को प्रथम सिद्धांत प्रदान किए तथा ध्यानगम्य उपनिषदीय पवित्रता के अभ्यास का सूत्रपात किया। प्रथमाचार्य देवेंद्रनाथ की उपासनाविधि इस प्रकार प्रधानत: उपनिषदीय थी। प्रेममय ईश्वर के अनुग्रह से प्राप्त अनुभूतिगम्य आत्मसाक्षात्कार उनका महत्वपूर्ण योग था। उन्होंने आध्यात्मिक साधना हेतु एक संस्था तत्वबोधिनी सभा का आरंभ किया। तत्वबोधिनी पत्रिका, सभा की प्रमुख पत्रिका के रूप में, बहुतों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी। देवेंद्रनाथ के नेतृत्व में एक अपूर्व निर्णय लिया गया कि वेद अच्युत नहीं हैं तथा तर्क एवं अंत:करण को सर्वोपरि प्रमाण मानना है। ब्रह्मसमाज ने प्रचार का तथा समाजसुधार का कार्य अपने हाथ में लिया। ब्रह्मसमाज के अंतर्गत केशवचंद्र सेन के आगमन के साथ द्रुत गति से प्रसार पानेवाले इस आध्यात्मिक आंदोलन के सबसे गतिशील अध्याय का आरंभ हुआ।

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