आने दो रे आने दो, उन्हें इस जीवन में आने दो

कैसी घोर विडंबना है ना जिस देवी को स्मरण कर मुझे पहचाना जाता है, उसे तो घर-घर सादर साग्रह बुलाया जाता है। और मैं उसी का स्वरूप, उसी का प्रतिरूप, मुझे इस खूबसूरत दुनिया में अपनी कच्ची कोमल आंखे खोलने से पहले ही कितनी कठोरता से कुचला जाता है। क्यों ? मैं एक भ्रूण हूं। अभी मेरा कोई अस्तित्व नहीं। मैं प्राकृतिक रूप से सृष्टि को आगे बढ़ाने का दायित्व लेकर अपनी मां की कोख में आई हूं। अब आप पहचान गए होंगे कि मैं सिर्फ भ्रूण नहीं बल्कि कन्या भ्रूण हूं। बालक भ्रूण होती तो गर्भ परीक्षण के बाद मुझे पहचाने जाने का स्वागत होता ‘जय श्री कृष्ण’ के पवित्र सांकेतिक शब्द के साथ । मगर मैं तो कन्या भ्रूण हूं ना, मेरे लिए भी कितना प्यारा पावन सांकेतिक शब्द है ‘जय माता दी’। पर नहीं मेरे लिए यह शब्द खुशियों की घंटियां नहीं बजाता, जयकारे का उल्लास नहीं देता क्योंकि इस ‘शब्द’ के पीछे ‘लाल’ खून की स्याही से लिखा एक ‘काला’ सच है जिससे लिखी जाती है मेरी मौत। खुद के अस्तित्व के मिटने से कहीं ज्यादा दुख, बल्कि ‘आश्चर्यमिश्रित दुख’ इस बात का है कि मेरी हत्या के लिए ‘जय माता दी’ जैसा ‍दिव्य उच्चारण करते हुए क्या नहीं कांपती होगी जुबान? एक बार भी याद नहीं आती होगी ‘मां’ के सच्चे दरबार की जहां पूरी धार्मिकता और आस्था के सैलाब के साथ दिल से निकलता है जय माता दी? वही जयकारा कैसे एक संकेत बन गया मेरी देह को नष्ट करने के अपवित्र संकल्प का। जिसने भी पहली बार मेरे आकार को तोड़ने और मेरी ही मां की कोख से मुझे बेघर करने के लिए यह प्रयोग किया होगा कितना नीच होगा ना वह? आह, मैं तो इस दुनिया में आई ही नहीं फिर दुनिया की ऐसी गालियां मेरे अंतर्मन से क्यों उठ रही है? मैं चिखती रहती हूं, तड़पती रहती हूं लेकिन कोई नहीं सुनता मेरी चित्कार। मुझे मांस का एक टुकड़ा समझ कर निर्ममता से निकाल दिया जाता है मेरी ही मां के गर्भ से। मां से क्या शिकायत करूं वह तो खुद बेबस सी पड़ी रहती है जब उसकी देह से मुझको उठाया जाता है। यही तो शिकायत है मेरी अपनी मां से। जब मुझे इस दुनिया में लाने का साहस ही नहीं तुममें तो क्यों बनती हो सृजन की भागीदार। तुम्हें भी तो तुम्हारी मां ने जन्मा होगा ना? तभी तो आज तुम मुझे कोख में ला सकी हो। सोचों, अगर उन्होंने भी ना आने दिया होता तुम्हें तब? तुम अपनी ही बच्ची के साथ ऐसा कैसे होने दे सकती हो? नौ दिन तक छोटी कन्याओं को पूजने वाली मां अपनी ही संतान को नौ माह नहीं रखती क्यों, क्योंकि वह कन्या भ्रूण है। नौ दिनों तक ‘स्त्री पूजा और सम्मान का ढोंग करने वालों’ अपनी आत्मा से पूछों कि देवी के नाम पर रचा यह संकेत क्या देवी ने नहीं सुना होगा? अगली बार जब किसी नन्ही आत्मा को पहचाने जाने के लिए तुम बोलो ‘जय माता दी’ तो मेरी कामना है कि तुम्हारी जुबान लड़खड़ा जाए, तुम यह पवित्र शब्द बोल ही ना पाओ, देवी मां करे, नवरात्रि में तुम्हारी हर पूजा व्यर्थ चली जाए… और आंकड़े यूं ही बढ़ते रहे तो तुम्हारे हर ‘पाप’ पर मेरे सौ-सौ ‘शाप’ लगे।

जाने किस-किस प्रतिभा को तुम
गर्भपात मे मार रहे हो
जिनका कोई दोष नहीं, तुम
उन पर धर तलवार रहे हो
बंद करो कुकृत्य – पाप यह,
नयी सृष्टि रच जाने दो
आने दो रे आने दो, उन्हें इस जीवन में आने दो
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One comment

  • बस इतनी सी इनायत मुझ पे एक बार कीजिए,कभी आ के मेरे ज़ख्मों का दीदार कीजिये।Thank's

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