गरीब से ज्यादा अमीर

अगर आप भारत को गरीब देश समझते है तो आप अपनी सोच बदलिए क्योकि भारत में गरीबो से ज्यादा अमीर लोग रहते है| यूँ तो सर्वेक्षण संस्थाएं भारत में तरह तरह के सर्वे करती रहती हैं लेकिन इस बार एक सर्वे के अनुसार देश में उच्च आय परिवारों की संख्या ४ करोड़ ६७ लाख हो जाने का अनुमान लगाया गया है जबकि निम्न आय परिवारों की तादाद ४ करोड़ १० लाख के आसपास मानी जा रही है VMW Team के सौम्या और साक्षी की एक बेहतरीन पेशकश आप के लिए…….

पिछले तीन साल में इकनॉमिक स्लोडाउन के बावजूद मार्च 2010 तक देश में हाई इनकम परिवारों की संख्या 4 करोड़ 67 लाख हो जाने अनुमान लगाया गया है जबकि लो इनकम परिवारों की तादाद 4 करोड़ 10 लाख के आसपास मानी जा रही है। अगर यह सच है तो पिछले एक दशक में आया यह बहुत बड़ा बदलाव है। हाई इनकम ग्रुप का परिवार उसे माना जाता है, जिसकी सालाना आमदनी 2001-02 की महंगाई के आधार पर एक लाख 80 हजार से ज्यादा हो। जिस परिवार के सदस्य सालाना 45 हजार रुपये तक कमाते हों, उसे लो इनकम फैमिली माना जाता है।
सालाना 45 हजार रुपये से ज्यादा और एक लाख 80 हजार रुपये से कम कमाने वाले मिडल क्लास में आते हैं। एनसीएईआर का एस्टिमेट है कि मिडल इनकम हाउसहोल्ड्स की संख्या में भारी इजाफा हुआ है। एक दशक पहले लो इनकम परिवारों की तादाद 6 करोड़ 52 लाख थी। तब मिडल इनकम फैमिलीज़ की संख्या 10 करोड़ 92 लाख थी, जो अब 14 करोड़ 7 लाख होने का अनुमान है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि स्लोडाउन का सबसे ज्यादा असर मिडल क्लास परिवारों पर पड़ा। नंबरों के लिहाज से मिडल क्लास परिवारों की संख्या भले ही 2007-08 के 13 करोड़ 59 लाख से बढ़कर 2009-10 में 14 करोड़ 7 लाख हो गई हो, लेकिन पर्सेंटेज में यह घट गई है। 2007-08 में मिडल इनकम परिवार कुल परिवारों के जहां 62 पर्सेंट थे, वहीं 2009-10 में यह घटकर 61.6 पर्सेंट रह गए। दिलचस्प पहलू यह है कि हाई इनकम परिवारों की तादाद स्लोडाउन के दौरान भी बढ़ती रही। पिछले दो साल में यह 16.8 पर्सेंट से बढ़कर 20.5 पर्सेंट हो गई है। लो इनकम ग्रुप फैमिलीज़ की संख्या भी इस दौरान 21.1 पर्सेंट से घटकर 17.9 पर्सेंट रह गई।
2 लाख से 10 लाख रुपये सालाना कमाने वालों को वर्ल्ड बैंक मिडल क्लास मानता है। ऐसे लोगों की संख्या 2009-10 तक बढ़कर 2 करोड़ 84 लाख हो गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, देश के मिडल क्लास में से दो-तिहाई परिवार शहरों में रहते हैं। यही नहीं, सेविंग करने में भी भारतीय आगे हैं। अनुमान है कि भारतीय परिवारों द्वारा की जाने वाली बचत की रकम जीडीपी के 36 पर्सेंट तक होती है।
पिछले तीन साल में इकनॉमिक स्लोडाउन के बावजूद मार्च 2010 तक देश में हाई इनकम परिवारों की संख्या 4 करोड़ 67 लाख हो जाने अनुमान लगाया गया है जबकि लो इनकम परिवारों की तादाद 4 करोड़ 10 लाख के आसपास मानी जा रही है। अगर यह सच है तो पिछले एक दशक में आया यह बहुत बड़ा बदलाव है। हाई इनकम ग्रुप का परिवार उसे माना जाता है, जिसकी सालाना आमदनी 2001-02 की महंगाई के आधार पर एक लाख 80 हजार से ज्यादा हो। जिस परिवार के सदस्य सालाना 45 हजार रुपये तक कमाते हों, उसे लो इनकम फैमिली माना जाता है।
सालाना 45 हजार रुपये से ज्यादा और एक लाख 80 हजार रुपये से कम कमाने वाले मिडल क्लास में आते हैं। एनसीएईआर का एस्टिमेट है कि मिडल इनकम हाउसहोल्ड्स की संख्या में भारी इजाफा हुआ है। एक दशक पहले लो इनकम परिवारों की तादाद 6 करोड़ 52 लाख थी। तब मिडल इनकम फैमिलीज़ की संख्या 10 करोड़ 92 लाख थी, जो अब 14 करोड़ 7 लाख होने का अनुमान है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि स्लोडाउन का सबसे ज्यादा असर मिडल क्लास परिवारों पर पड़ा। नंबरों के लिहाज से मिडल क्लास परिवारों की संख्या भले ही 2007-08 के 13 करोड़ 59 लाख से बढ़कर 2009-10 में 14 करोड़ 7 लाख हो गई हो, लेकिन पर्सेंटेज में यह घट गई है। 2007-08 में मिडल इनकम परिवार कुल परिवारों के जहां 62 पर्सेंट थे, वहीं 2009-10 में यह घटकर 61.6 पर्सेंट रह गए। दिलचस्प पहलू यह है कि हाई इनकम परिवारों की तादाद स्लोडाउन के दौरान भी बढ़ती रही। पिछले दो साल में यह 16.8 पर्सेंट से बढ़कर 20.5 पर्सेंट हो गई है। लो इनकम ग्रुप फैमिलीज़ की संख्या भी इस दौरान 21.1 पर्सेंट से घटकर 17.9 पर्सेंट रह गई।
2 लाख से 10 लाख रुपये सालाना कमाने वालों को वर्ल्ड बैंक मिडल क्लास मानता है। ऐसे लोगों की संख्या 2009-10 तक बढ़कर 2 करोड़ 84 लाख हो गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, देश के मिडल क्लास में से दो-तिहाई परिवार शहरों में रहते हैं। यही नहीं, सेविंग करने में भी भारतीय आगे हैं। अनुमान है कि भारतीय परिवारों द्वारा की जाने वाली बचत की रकम जीडीपी के 36 पर्सेंट तक होती है।

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सौम्या और साक्षी
VMW Team

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