Monthly Archives: February 2011

रेल बज़ट- दरियादिली नही दीदी की,यह दीदी की माया है

डॉ. आर. वी. चतुर्वेदी
  आज ममता बनर्जी  अपना रेलवे बजट पेश कर रही है, सुबह से ही मीडिया का फोकस रेलवे बजट पर था, न्यूज़ एंकर ग्राफिक्स की बनीं ट्रेनों में बैठकर एंकरिंग कर अपना मज़ाक उडवा रहे और संवाददाता रेलवे स्टेशनों में जा-जाकर लोगों से उनकी बजट पर राय ले रहे थे। न्यूज़ चैनलों में ममता उनकी दीदी बनकर छायीं रहीं रेल बज़ट पर VMW Team  के डॉ. आर. वी. चतुर्वेदी जी की एक रिपोर्ट…

    25 फरवरी जैसे-जैसे नजदीक आ रही है वैसे-वैसे दिल की धड़कने तेज हो रही हैं। सांसें अटकी हैं। डर लग रहा है कहीं नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पटना जाने वाली उसी ट्रेन की सेकेंड क्लास टिकट खरीदने के लिए जेब से ज्यादा पैसे तो खर्च नहीं करने पड़ेंगे। घर जाने से पहले 10 बार सोचने की नौबत तो नहीं आएगी। बड़े भाई देवरिया  में रहते हैं। कहीं उनके बुलावे पर बहाना तो नहीं बनाना पड़ेगा। जी हां रेल बजट आने वाला है। एक साल से घर का बजट आर्थिक मंदी ने बिगाड़ा है। घर के कुछ बर्तन संभाल के इकठ्ठा किए तो महंगाई ने उसे तितर-बितर कर दिया। शहर में रहने वालों को गांव के अनाज का सहारा था। लेकिन डर है कि कहीं रेलवे का बजट बिगड़ गया तो गांव जाने का हालत भी नहीं रहेगी। लालू यादव का रेलवे बजट लंदन के मैनेजमेंट वालों को भी भाया। लेकिन ममता बनर्जी का पिछला रेल बज़ट कुछ खास नहीं रहा, एक अदद रेलमंत्री हिमाचल से होगा तो वहां भी रेल चलेगी वरना यूं लगता है कि रेलों की ज़रूरत केवल बिहार ओर बंगाल में ही पड़ती है…
ममता बनर्जी अपने हर भाषण में खुद को गरीबों का मसिहा बताते हुए कहती है  कि ‘उन्होंने अपने पुरे कार्यकाल में न ही रेल किराया बढाकर आम लोगों पर अतिरिक्त बोझ डाला है और न ही घाटे का रेल बज़ट पेश किया़’.पर क्या रेलमंत्री लोगों को इस हद तक बेवकूफ समझते हैं कि आम जनता उनकी बातों का सही आकलन भी नहीं कर सकती?
उन्होंने लाभ का बज़ट पेश ज़रुर किया है पर भाड़े को पिछले दरबाजे से बढाकर.आज स्थिति यह है कि ट्रेनों की संख्या बढाने के बजाए, जनरल कोटे के सीट घटाकर तत्काल कोटे की सीट संख्या बढा दी गई है.ट्रेनों को सुपरफास्ट कर भाड़ा तो अधिक वसूला जा रहा है पर आज भी वे ट्रेनें सफ़र तय करने में उतना ही समय ले रही है जितना पहले लेती थी|

रेलवे की तरह नेता और बाबु का भी बज़ट भारी-भरकम होता है
तभी तो रेल मंत्रालय के लिए,मारा – मारी होता है।
 
डॉ. आर. वी. चतुर्वेदी
VMW Team (India’s New Invention)
+91-9044412246,45,27,23

कश्मीर.. धरती का स्वर्ग और भारत का मुकुट

 

 एम.के.पाण्डेय “निल्को जी”

कश्मीर जिसे धरती का स्वर्ग और भारत का मुकुट कहा जाता था आज भारत के लिए एक नासूर बन चूका है। कारण सिर्फ मुस्लिम जेहाद के तहत कश्मीर को इस्लामिक राज्य बना कर पाकिस्तान के साथ मिलाने की योजना ही है, और आज रास्त्रद्रोही अलगाववादियों ने अपनी आवाज इतनी बुलंद कर ली है की कश्मीर अब भारत के लिए कुछ दिनों का मेहमान ही साबित होने वाला है और यह सब सिर्फ कश्मीर में धारा ३७० लागु कर केंद्र की भूमिका को कमजोर करने और इसके साथ साथ केंद्र सरकार का मुस्लिम प्रेम वोट बैंक की राजनीति और सरकार की नपुंसकता को साबित करने के लिए काफी है VMW Team के एम.के.पाण्डेय “निल्को जी” की पेशकश….
                    भारत एक महान देश है और यहाँ के लोग और भी ज्यादा महान हैं । ख़ुद को क्रिकेट खेलना नहीं आता होगा लेकिन क्रिकेट खिलाड़ियों पर कमेन्ट जरुर करेंगे, ख़ुद राजनीति का हिस्सा नहीं बनेगे लेकिन राजनीति को भला बुरा जरुर कहेंगे। यह बात कश्मीर के इतिहास से साबित हो जाता है जब सरदार बल्लव भाई के नेतृतव में भारतीय सेना ने कश्मीर को अपने कब्जे में ले लिया था परन्तु नेहरु ने जनमत संग्रह का फालतू प्रस्ताव लाकर विजयी भारतीय सेना के कदम को रोक दिया जिसका नतीजा पाकिस्तान ने कबाइली और अपनी छद्म सेना से कश्मीर में आक्रमण करवाया और क़ाफ़ी हिस्सा हथिया लिया। और कश्मीर भारत के लिए एक सदा रहने वाली समस्या बन कर रह गयी, जब जम्मू-कश्मीर के वंधामा में दस साल पहले हुए कश्मीरी पंडितों के नरसंहार के बारे में गृह मंत्रालय को जानकारी नहीं है। मंत्रालय ने कहा है कि विभाग को ऐसी किसी घटना की जानकारी नहीं है, जिसमें बच्चों समेत 24 कश्मीरी पंडितों का नरसंहार किया गया था। यह घटना जग विदित है मगर सरकार को इसके बारे में मालूम नहीं, सरकार के इसी निक्कम्मा पन  के वजह से आज इन राष्ट्दोर्ही अलगाववादियों का हिम्मत इतना बढ़ गया है की अब ये कश्मीर को पूर्ण इस्लामिक राज्य मानकर कश्मीर को पाकिस्तान के साथ मिलाने के लिए अब कश्मीर में बाहरी  राज्यों से आये हिन्दू मजदूरों को बहार निकल रहे हैं स्वतंत्रता दिवस के पवन अवसर पर हिंदुस्तान के राष्ट घ्व्ज को जलाया गया हिंदुस्तान मुर्दाबाद का नारा लगाया जा रहा है और सरकार मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने के लिए चुप बैठी है कश्मीर में आर्मी के कैंप पर हमला करके उनको जलाया जा रहा है फिर हम कैसे कह सकते हैं की कश्मीर हमारे अन्दर में है अगर कश्मीर का मुस्लिम हमारे साथ है तो क्यों वह देशद्रोही अलगाववादियों का साथ दे रही है? अगर केंद्र सरकार कश्मीर समस्या का समाधान चाहती है तो क्यों नहीं वह वहां के अलगाववादी आतंकवादियों को के खिलाफ एक्शन ले रही है? क्यों नहीं सरकार विस्थापित कश्मीरी पंडितों को फिर से उनके जमीन को वापस दिला रही है क्यों कश्मीरी पंडितो के हक़ का दमन कर रही है ? क्यों नहीं आज तक हुए कश्मीर में कश्मीरी पंडितो के हत्याकांडो की जाँच करवा रही है ? कश्मीरी भाइयो का साथ देने वाले साम्प्रदायिक और अलगाववादी देशद्रोही सरकार के नज़र में क्यों आज़ादी का नेता बना हुआ है ? अगर इस सवाल का जवाब सरकार के पास नहीं है तो सरकार देश की जनता को धोखा देना छोर दे की कश्मीर हमारा है और अगर सरकार सच में कश्मीर समस्या का समाधान चाहती है तो कश्मीरी पंडितो को इंसाफ दिलाये और अलगाववादी आतंकवादियों को सजा देकर कश्मीर को इन देशद्रोहियों से मुक्त कराये, अंत में एक सवाल सरकार और आपलोगों से क्या हिंदुस्तान जिंदाबाद का नारा लगाने वाले अपने राष्ट घ्व्ज तिरंगे को सीने से लगाये मरने वाले साम्प्रदायिक हैं ? क्या हिंदुस्तान मुर्दाबाद का नारा लगा कर अपने राष्ट घ्व्ज तिरंगे को जलाने वाला देशद्रोही नहीं और अगर देश द्रोही है तो इसके खिलाफ कोई एक्शन क्यों नहीं ?

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 एम.के.पाण्डेय  “निल्को जी”
VMW Team(India’s New Invention)

भारत के विदेश मंत्री एस एम कृष्णा ने पुर्तगाल के विदेश मंत्री का बयान पढ़ना शुरू कर दिया..

रुपेश तिवारी
भारत के विदेश मंत्री एस एम कृष्णा ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक के दौरान भूलवश पुर्तगाल के विदेश मंत्री का बयान पढ़ना शुरू कर दिया. बहरहाल, एक भारतीय अधिकारी द्वारा ध्यान दिलाये जाने के बाद कृष्णा ने इस भूल को सुधार लिया. अगर वहा भारतीय अधिकारी न होता तो भारत के विदेश मंत्री एस एम कृष्णा की क्या इज्जत होती हम सबको पता है VMW Team के रुपेश तिवारी की बेहतरीन पेशकश आप के लिए…..  

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुरक्षा और विकास पर आयोजित बहस में भारतीय विदेश मंत्री कृष्णा करीब तीन मिनट तक पुर्तगाल के विदेश मंत्री का बयान पढ़ते रहे लेकिन संयुक्त राष्ट्र में भारत के दूत हरदीप सिंह पुरी ने उनका ध्यान इस तरफ दिलाया जिसके बाद उन्होंने अपनी गलती सुधार ली. मेरे ख्याल से तो भारत के दूत हरदीप सिंह पुरी को इनाम देना चाहिए उन्होंने भारत के विदेश मंत्री की नाक बचा ली. विदेश मंत्री एस एम कृष्णा तीन मिनट तक लगातार पुर्तगाल के विदेश मंत्री लुइस अमाडो का बयान पढ़ते रहे और उन्हें अपनी गलती का एहसास भी नहीं हुआ क्योंकि बयान का शुरूआती भाग संयुक्त राष्ट्र, विकास और सुरक्षा से संबंधित सामान्य मुद्दों पर केंद्रित था लेकिन कुछ पंक्तियां अलग भी थीं. इनमें से एक पंक्ति थी जो कृष्णा ने पढ़ी ‘पुर्तगाली भाषा बोलने वाले दो देशों, ब्राजील और पुर्तगाल के यहां एक साथ होने के सुखद संयोग को देखते हुए मुझे गहरा संतोष जाहिर करने की इजाजत दीजिए’ कृष्णा को इसमें कुछ अटपटा नहीं लगा होगा क्योंकि हाल ही में ब्राजील ने सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता की थी. पुरी के टोकने से पहले उन्होंने पढ़ा ‘ यूरोपीय संघ भी संयुक्त राष्ट्र के साथ इसी तरीके से जवाब दे रहा हैं’ पुरी ने कृष्णा से, उनकी भूल की ओर ध्यान दिलाने के बाद कहा कि आप इसे फिर से शुरू कर सकते हैं. पुर्तगाल के विदेश मंत्री भारत के विदेश मंत्री के बोलने के पहले अपनी बात रख चुके थे. किन्तु अगर ध्यान से सुने भी होते तो शायद यह गलती नहीं करते .  
कोई बात नहीं जब चिड़िया खेत……
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रुपेश तिवारी
VMW Team (India’s New Invention)

नजर लगना सिर्फ मन की भ्रांति नहीं..



रवि गुप्ता



नीरज मिश्रा



नजर लगना.. हम यह शब्द बचपन से सुनते आ रहे हैं। नजर लगना सिर्फ मन की भ्रांति नहीं बल्कि एक वैज्ञानिक क्रिया है। VMW Team के रवि गुप्ता और नीरज मिश्रा की एक रिपोर्ट..
 विज्ञान के अनुसार शरीर में विद्युत तरंगें होती है। इन विद्युत तरंगों से किसी प्रकार से बाधित होने पर शरीर लकवे का शिकार हो जाता है अत: शरीर की विद्युतीय तरंगता से नजर लगने का सीधा संबंध है। बड़ों की तुलना में बच्चों को अधिक नजर लगती है क्योंकि बच्चों का शरीर कोमल होता है तथा उनके शरीर में विद्युतीय क्षमता बड़ों की तुलना में कम होती है। यदि कोई बच्चों को एकटक देखता रहता है तो उसकी नजरों की ऊर्जा बच्चे की ऊर्जा को प्रभावित करती है जिसके कारण बच्चा अनमना या बीमार हो जाता है। कई बार देखा गया है की नज़र के कारण अच्छा बाला व्यवसाय अचानक रुक जाता है नहीं तो अनेक प्रकार की परेशानिया आती रहती है जेसे बच्चे या बड़े दोनों को ही नज़र लग सकती है जिससे वह बीमार पड़ जाते है भारतीय समाज में नजर लगना और लगाना एक बहु प्रचलित शब्द है। लगभग प्रत्येक परिवार में नजर दोष निवारण के उपाय किये जाते हैं। घरेलु महिलाओं का मानना है कि बच्चों को नजर अधिक लगती है। बच्चा यदि दूध पीना बंद कर दे तो भी यही कहा जाता है कि भला चंगा था, अचानक नजर लग गई। लेकिन क्या नजर सिर्फ बच्चों को ही लगती है? नहीं। यदि ऐसा ही हो तो फिर लोग ऐसा क्यों कहते हैं कि मेरे काम धंधे को नजर लग गई। नया कपड़ा, जेवर आदि कट-फट जाएँ, तो भी यही कहा जाता है कि किसी की नजर लग गई। हम सबकी कभी न कभी मुट्ठी भर नमक, तेल की बत्ती या डंडी वाली सूखी लाल मिर्च से नानी-दादी या माँ ने नजर जरूर उतारी होगी। ट्रकों के पीछे “बुरी नजर वाले तेरा मुँह काला” पढ़ने को मिल ही जाता है। नजर की कोई स्पष्ट परिभाषा तो नहीं है परंतु अनुभव के आधार पर कहा जा सकता है कि बुरी भावना या ईष्र्या की भावना से यदि कोई हमें या हमारी किसी सुन्दर वस्तु को देखता है तो स्वास्थ्य या उस वस्तु से संबंधित कष्ट होता है इसे ही नजर लगना कहते हैं। नजर सम्मोहन का नकारात्मक स्वरूप है।
प्राय नजर से बचने के लिए काला धागा पहनाने या काला टीका या काजल लगाने की परंपरा रही है। स्पष्ट है कि काला रंग नजर लगाने वाले की एकाग्रता को भंग कर देता है। तिलक लगाने और मंगल-सूत्र पहनने स्फटिक बनाने के पीछे यही भावना है। इसका भी वैज्ञानिक कारण है। विज्ञान भी यह मानता है कि काला रंग ऊष्मा का अवशोषक है। अत जब बच्चे को काला टीका या काला धागा बांधा जाता है तो वह किसी भी प्रकार की ऊष्मा बुरी नजर को बच्चों में प्रवेश नहीं करने देता तथा स्वयं ही अवशोषित कर लेता है। इसी वजह से बच्चों को नजर नहीं लगती। 
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 नीरज मिश्रा और रवि गुप्ता 
VMW Team (India’s New Invention)

आम आदमी

आम आदमी पर लोगो का नजरिया पेश कर रहे है VMW Team के राजेश  गिरी “राज गोस्वामी”

राजेश गिरी “राज गोस्वामी”

सजीव सारथी कहते है की –
लफ्ज़ रूखे, स्वर अधूरे उसके,
सहमी सी है आवाज़ भी,
सिक्कों की झंकारें सुनता है,
सूना है दिल का साज़ भी,
तनहाइयों की भीड़ में गुम ,
दुनिया के मेलों में,
जिन्दगी का बोझ लादे ,
कभी बसों में , कभी रेलों में,
पिसता है वो, हालात की चक्कियों में,
रहता है वो, शहरों में , बस्तियों में,
घुटे तंग कमरों में आँखें खोलता,
महंगाई के बाजारों में खुद को तोलता,
थोडा सा रोता, थोडा सा हंसता,
थोडा सा जीता, थोडा सा मरता,
रोज युहीं चलता – आम आदमी ।
मौन दर्शी हर बात का ,
धूप का बरसात का,
आ जाता बहकाओं में ,
खो जाता अफवाहों में,
मिलावटी हवाओं में,
सडकों में फुटपाथों में,
मिल जाता है अक्सर कतारों में,
राशन की दुकानों में,
दिख जाता है अक्सर,
अपनी बारी का इंतज़ार करता –
दफ्तरों -अस्पतालों के बरामदों में ,
क्यों है अखिर ,
अपनी ही सत्ता से कटा छठा ,
क्यों है यूं ,
अपने ही वतन में अजनबी –
आम आदमी ।

 

वही सुरेश चन्द्र गुप्ता लिखते है की –
बेशर्म आम आदमी,
हर समय शिकायत करता है,
सरकार ने यह नहीं किया,
सरकार ने वह नहीं किया,
बेबकूफ यह भी नहीं जानता,
सरकार आम आदमी से बनती है,
आम आदमी से चलती नहीं,
सरकार बनाने की कीमत दी थी तुझे,
दारू, मुर्गा, कम्बल और ढेर आश्वासन,
साला सब भूल गया,
एहसान फरामोश कहीं का,
कितनी दरियादिल है सरकार,
हर पांच साल बाद आती है,
और बांटती है दारू, मुर्गा, कम्बल,
पुराने और नए-नए आश्वासन,
पर बेशर्म आम आदमी,
करता रहता है हर समय शिकायत.
———-
राजेश गिरी “राज गोस्वामी”
भटनी, देवरिया

सूचना के अधिकार

रवि कुमार पाण्डेय



त्रिपुरेन्द्र कुमार ओझा “नीशू”



सरकारी कार्यालयों में अक्सर लोगों का काम अटकाने का मामला सामने आता रहता है आम आदमी को इस समस्या से छुटकारा दिलाने के उद्देश्य से भारत सरकार नें वर्ष २००५ में राइट्स टू इन्फार्मेशन एक्ट ( आर. टी. आई ) कानून बनाया । जम्मू-कश्मीर को छोड़ कर यह कानून देश के सभी हिस्सों में लागू है । देश का कोई भी नागरिक इस अधिकार का इस्तेमाल कर सकता है । VMW Team के  रवि कुमार पाण्डेय और टी.के.ओझा “नीशू” की बेहतरीन खोज केवल  आप के लिए…..
वैसे तो सूचना  का अधिकार कानून इस देश के हर नागरिक को सशक्त बनाता है. और इसे कमजोर करने की कोई भी कोशिश अंतत: देश के हर आदमी को कमजोर करेगी. लेकिन हममें से बहुत से लोग जो अपने भ्रष्टाचार, जान पहचान, छल-कपट के गुण, पैसे, दिखावे आदि के दमपर इस तरह की कमजोरी से पार पाने के भ्रम में जी रहे हैं, उन्हें शायद सूचना के अधिकार कानून के कमजोर होने से फर्क नहीं पड़ेगा.  इसलिए उनसे उम्मीद भी नहीं की जा सकती कि सूचना के अधिकार कानून को कमजोर किए जाने की किसी कोशिश के खिलाफ वे बोल सकेंगे.
इस कानून का मकसद सार्वजनिक विभागों के कामों की जवाबदेही तय करना और पारदर्शिता लाना ताकि भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सके । इसके लिए सरकार नें केंद्रीय सूचना आयोग और राज्य सूचना आयोगों का गठन भी किया है ।
आरटीआई कानून के दायरे में आने वाले विभाग :- सरकारी दफ्तर, पीएसयू, अदालतें, संसद व विधानमंडल, स्थानीय संस्थाए, सरकारी बैंक, सरकारी अस्पताल, बीमा कम्पनियाँ, चुनाव आयोग, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, और राष्ट्रपति कार्यालय आदि आरटीआई कानून के दायरे में आते है । इनके आलावा वैसे एनजीओ जो सरकार से फंडिंग प्राप्त करते हों, पुलिस, सीबीआई व सेना के तीनों अंगों की सामान्य जानकारी भी इस कानून के तहत ली जा सकती है ।
किसी भी खुफिया एजेंसी की वैसी जानकारियां जिनके सार्वजनिक होने से देश की सुरक्षा व अखंडता को खतरा हो, को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है । लेकिन मानवाधिकार उल्लंघन होने व इन संस्थाओं में भ्रष्टाचार के मामलों की जानकारी ली जा सकती है । अन्य देशों के साथ भारत के सम्बन्ध से जुड़े मामलों की जानकारी को भी इस कानून से अलग रखा गया है साथ ही साथ निजी संस्थाओं को भी इस दायरे से बाहर रखा गया है । लेकिन इन संस्थाओं की सरकार के पास उपलब्ध जानकारी को सम्बंधित विभाग के माध्यम से हासिल किया जा सकता है ।
यह कानून तमाम समस्याओं का समाधान नहीं बल्कि समाधान की शुरुआत है. “हम अकेले क्या कर सकते हैं?” का जवाब है. सूचना के अधिकार कानून का इस्तेमाल कर रहा हर आदमी देश को बेहतर बनाने में अपनी तरफ से आहूति दे रहा है. ..
रवि पाण्डेय और त्रिपुरेन्द्र ओझा
 
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