उल्लूगीरी क भी आपन महत्व ह

 उल्लू! एगो प्राचीन पक्षी। एतना प्राचीन कि जब ब्रह्माण्ड के संरचना भइल त विष्णु भगवान की नाभि से कमल निकरल आ ओपर ब्रह्मा जी पैदा भइलन। मतलब ब्रह्मा की पैदाइश से पहिले शेश शैय्या पर सुतल विष्णु भगवान आ उनकर पांव दबावत लक्ष्मी मैया। ओही लक्ष्मी मइया के वाहन हवें उल्लू। हम अपना ‘उल्लूगिरी’ से इ सिद्ध क दिहलीं कि उल्लू के पैदाइशी ब्रह्मा जी से भी पहिले भइल होई। ‘उल्लू’ केवल एगो पक्षी ना ह। ओकर कई गो रूप-स्वरूप बा। जबतक देश-दुनिया में उल्लूगीरी रही। गदहन की राज में लात आ बात क घमासान चली। केहू यदि बड़ा चालाक बनत बा त ओकरा पीछे जरूर कवनो ‘उल्लू की पट्ठा’ के हाथ बा। केहू यदि केहू के ‘उल्लू बनावत’ बा त उल्लू बने वाला के ही दोष बा। सब जान-बूझ के उल्लू बनल मजबूरी बा। उल्लू प्रकृति क ग्राफ बैलेंस करेवाला जीव ह। यदि दुनिया में सब चालाक ही हो जाई त व्यवस्था गड़बड़ा जाई येह लिए कुछ उल्लू टाइप के लोग भी रहे के चाही। तबे होशियार लोग आपन ‘उल्लू सीधा’ करत रहिहन।
            तनी सोचीं, अगर दिन में भी उल्लू का दिखाई देवे लागे बत का होई? हो सके लक्ष्मी मइया के कवनो जाम की झाम में अकेले छोड़ के फुर्र से उड़ जा। लक्ष्मी मइया धन के देवी हईं कि जमाना एडवांस भइला की बाद भी कवनो लग्जरी गाड़ी के आपना वाहन ना बनवली। जेतने महंगा गाड़ी ओतने खर्चा। लक्ष्मी मइया की वाहन की मेन्टीनेंस पर कानी कौड़ी क भी खर्चा ना बा। दिनभर उल्लू बेचारे क लउकबे ना करी आ रात की बेरा कवनो मुड़ेर पर यदि मुर्रर… मुर्रर… बोलले त लोग का अपशकुन ही लागी। वर्ष में एक दिन अइसन पंक्षी के पूजा आ आदर के व्यवस्था बनावेवाला भी उल्लू ना रहलन। असों की दीवाली पर खुशी मनावल गइल। दीप जलावल गइल। पूवा-पकवान खाइल-खियावल गइल। लक्ष्मी मइया के जयकार मनावल गइल। आ जइसे चोर अमवस्या जगावें लें, ओइसे अपनी अन्दर की ‘उल्लूगीरी’ के जगावल गइल। फिर वर्षभर आपन उल्लू सीधा कइल जाई लोग के उल्लू सीधा कइल जाई लोग के उल्लू बनाके। दीपावली मनल, गोधन कुटाइल अब छठ के तैयारी बा। बाजार से सब फल सब्जी खरीद के चढ़ावल जाई।

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