भ्रष्टाचार को नमस्कार!

भ्रष्टाचार को नमस्कार! नमस्कार इसलिए कि सदाचार ने इसके समक्ष घुटना टेक दिया है। इसी का बोलबाला है। बात शुरू करता हूं, अपने पड़ोस से। पड़ोसी कभी चोरी में फंसा था। पहले आंखे चुराता था अब तरेरता है। मुझे रहा नहीं गया। एक दिन मैं पूछ बैठा। अरे, भाई आंखें क्यों तरेरते हो। पडोसी हो पडोसी धर्म तो निभाओ। उसने पलटवार किया। बोला- तुमने धर्म निभाया। मूंछ पर हाथ फेरते हुए- पन्द्रह वर्ष पहले जब मैं चोरी में फंसा तो अखबार में क्यों छापा? समाज की डर से भागकर मुम्बई जाना पड़ा। वहां पर भी चोरी की, झूठ बोला, लूट-खसोट किया। आज मौज में हूं। क्या नहीं है मेरे पास। जमाना बदल गया। इसी की पूछ है। अभी बात चल ही रही थी कि इस बीच आठ-दस लोग रास्ते से गुजरे और सभी मूंछ वाले का पैर छूकर कुशल क्षेम पूछा और आगे बढ़ गए। पडोसी बोला-देखे, इसे कहते हैं शोहरत। मेरे सामने से जो भी गुजरता है, नतमस्तक होकर ही जाता है। तुम बने रहो ईमानदार कोई पूछेगा नहीं।
मैने सोचा, भ्रष्टाचार में वाकई दम आ गया है क्या? जिसकी व्याख्या ज्ञानियों ने अपने-अपने ढंग से की है। यथा लूट, चोरी, डकैती, हत्या, झूठ, फरेब, धोखाधडी, विश्वासघात रिश्वतखोरी, हरामखोरी, लालच, छल …। जैस हरि के हजार नाम, वैसे भ्रष्टाचार के भी। भ्रष्टाचार में बहुत गुण हैं। बच्चा ईमानदारी से परीक्षा देगा तो मेरिट में पिछड़ जाएगा। भ्रष्टाचार की कृपा नहीं होती तो जिन्हें आज सलाखों के पीछे होना चाहिए, वे सदन की शोभा नहीं बढ़ाते? दफ्तरों में बाबुओं की मेज पर फाइल आगे नहीं सरकती? न्यायालय में पेशकार बिना भेंट के ही तारीख दे देता? अभी मैं सोच ही रहा था, तभी हमारे बडे भाई देहाती जी गांव से शहर आ गए। बोले- किस उधेड़बुन में हो भाई। बात बढ़ी, तो बोले-हम जैसे नास्तिकों का मानना है कि भगवान नामक अदृश्य शक्ति से कम शक्तिमान नहीं है दृश्यवान भ्रष्टाचार। यह असंभव को भी संभव बनाने की क्षमता रखता है। बड़े-बड़ों को घुटना टेकने पर मजबूर कर देता है। भ्रष्टाचार तो आदि काल से ही है। भगवान भोले शंकर की दो संताने कार्तिकेय व गणेश में पृथ्वी के भ्रमण की होड़ लगी। कार्तिकेय दौडऩे लगे और गणेश जी माता-पिता की ही परिक्रमा कर जीत गए। यह कैसी ईमानदारी? श्रीहरि ने वामन का रूप धारण कर राजा बलि से तीन डेग जमीन मांगी। बलि बेचारा क्या जाने कि बौने की टांग इतनी लम्बी हो जायेगी कि पृथ्वी के अलावा अपनी पीठ भी नपवानी पडेगी। श्रीहरि ने महाप्रतापी दानी राजा बलि से छल, क्या यह भ्रष्टाचार की श्रेणी में नहीं आता? हरिश्चंद्र ऐसे सत्यवादी को भी भ्रष्टाचार ने सांसत में डाल दिया। विश्वामित्र बड़े तपस्वी व महान ऋषि थे। सपने झूठे होते हैं, पर सपने में किए दान को उन्होंने ऐसे वसूला कि चक्रवर्ती सम्राट को डोम के घर बिकना पड़ा। बेटे को बेचना पड़ा। पत्नी नीलाम हुई। मरघट की रखवाली करनी पड़ी।
सतयुग में गौतम ऋषि की नारी अहिल्या से देवता छल करते हैं। आधी रात को मुर्गा क्या बोला ऋषि गंगा स्नान करने चले गये। इधर छलिया इंद्र एवं चन्द्र उनके घर में घुस गए। भला हो गंगा मइया का, उन्होंने गौतम को सचेत कर दिया। गौतम पहुंचे और मृगछाला चला कर वार कर दिया। चन्द्रमा पर आज भी मृगछाला के निशान हैं। इन्द्र व चन्द्र का यह कार्य क्या भ्रष्टाचार की श्रेणी में नहीं आता?
बात करते हैं त्रेता की। मर्यादा भगवान पुरुषोत्तम श्रीराम का जन्म पापियों के नाश एवं विश्व कल्याण के लिए हुआ था। बालि को ताड़ की आड़ में मारना क्या छल नहीं? रावण ऐसे प्रतापी को मारने के लिए भाई विभीषण को तोड़ लेना क्या न्याय संगत है? घोर राजनीति युग द्वापर में भगवान ने सोलह कला का अवतार लिया था। समूची महाभारत भ्रष्टाचार के दृष्टांतों से भरी है। पांच पतियों की एक पत्नी…। जुआरियों ने दंाव पर लगा दिया। मामा शकुनी की चाल में भांजा दुर्योधन ने बाजी मार ली। चीर हरण होने लगा। यहां भगवान को लाज बचाने के लिए बस्त्रावतार लेना पड़ा। लाक्षा गृह में आग लगवाना। चक्र व्यूह की रचना। अभिमन्यू का बध। जयद्रथ बध के लिए भगवान भास्कर को सुदर्शन चक्र की आड़ देकर सूर्यास्त का भ्रम फैलाना। युधिष्ठिर जैसे सत्यवादी को अर्ध सत्य का सहारा लेकर अश्वस्थामा मरो, नरो वा कुंजरों का उदघोष करना आदि अनगिनत उदाहरण क्या भ्रष्टाचार की श्रेणी में नहीं आते? भ्रष्टाचार सतयुग, त्रेता, द्वापर में था तो कलयुग में क्यों नहीं। उन तीनों युगों में लोगों की उम्र बड़ी होती थी इसलिए भ्रष्टाचार की गति धीमी थी। कलयुग में उम्र छोटी होती है इसीलिए इसकी गति तेज है। क्या लोगों की तरक्की के पीछे भ्रष्टाचार का सच नहीं छिपा है?
हम ठहरे धार्मिक। मुझे तो बडे भाई की बात अच्छी नहीं लगी। पर बात थी जो आगे बढ़ गयी।
आज धर्म का चोला ओढ़े तमाम धर्म के ठेकेदार समाज से बुराईयां दूर करने के लिए अभियान छेड़े हैं। पर उनका एक ही मकसद है धन बटोरना। परदे की आड़ में उनका कृत्य कैसा है, दुनिया देखती है। पूछ बैठिए, उनके अनुयायियों से, तो लड़ बैठते हैं। कहते हैं, उनसे अच्छाई ग्रहण करो, उनकी बुराई पर न जाओ। बाबा जयगुरुदेव ने तो समाज सुधारने के लिए लोगों को टाट तक पहना दिया। श्रीराम शर्मा आचार्य जी तो कह गए कि हम सुधरेंगे तो जग सुधरेगा। पर दुख की बात है कि हम नहीं सुधरे। अगर हम सुधरते तो भष्टाचार का दानव इस कदर न जकड़ा होता।

ब्रजेश कुमार पाण्डेय
दैनिक जागरण
गोरखपुर

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