अभिशाप———–इन्सेफेलाइटिस

पिछले तीन दशक कई लोकसभा और विधानसभा चुनाव हुए…हर चुनाव में इन्सेफेलाइटिस एक अहम मुद्दा बन के उभरा लेकिन उसके बाद भी इस पर राजनीति का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है…ये अलग बात है कि कोई भी नेता अथवा पार्टी इस अभिशाप को रोकने के लिए सरकारी स्तर पर ठोस पहल कराने में नाकाम रही है…
पूंर्वांचल के हर चुनाव में जाति धर्म प्रमुखता से मुद्दा बन के उभरता है…लेकिन पूर्वांचल के लिए अभिशाप बन चुके इन्सेफेलाइटिस के लिए मिलता है तो बस आश्वासन…..गोरखपुर-बस्ती मण्डल के अस्पतालो में पीड़ा झेल रहे परिवारों को अब तक केवल झुनझुना ही मिला है…..ऐसे हाल में वो अपना दर्द लेके जायें तो जायें कहां…..बस इसको नियति का खेल मानकर अपने कलेजे के टुकड़े को मौत के मुंह में जाते हुए देख, रो गा के सब्र कर लेते हैं….साल १९७८ में भारत में पहली बार इस महामारी ने दस्तक दी थी….पूर्वांचल में भी यह दैत्य इसी साल आया था ….सामाजिक और आर्थिक रुप से पिछड़े इस क्षेत्र में इसे अनूकूल माहौल मिला …और बाद में सरकारी उदासीनता के चलते यह बढ़ता चला गया….आंकड़ो की बात अगर की जाय तो….१९७८ में जहां इस बीमारी ने कुल २३८६ लोगों को अपना शिकार बनाया था जिसमें कि ७२१ लोगों की मौत हो गयी….बाद में इस बीमारी ने गोरखपुर बस्ती मण्डल को अपना घर बना लिया…..और अभी तक यह राक्षस नौ बार इस इलाके में मौत का भयानक ताण्डव कर चुका है….१९८० में इससे १५१६ लोग पीड़ित हुए थे….जिसमें कि ४९६ लोगों की मौत हो गयी…१९८५ में ११६९ पीड़ितों में ४०४ की मौत हो गयी….१९८८ में ३८९७ पीड़ितों में १२२८ लोगों की मौत हो गयी….१९८९ में १३८३ पीड़ितो में ६५९ लोगों की मौत हो गयी…….नवासी के बाद चौदह साल की चुप्पी और फिर एक बार पलटवार किया साल २००५ में ….जो कि अब तक के इतिहास में सबसे भयानक रहा….और ४७२० पीड़ितो में ११६१ लोग मौत के मुंह में समा गये…..इसके बाद से लगातार इसका कहर जारी है….२००६ में पूर्वांचल के विभिन्न अस्पतालो में २०३० मरीज आये जिसमें ४३५ की मौत हो गयी ….और २००७ में २७९० पीड़ितो में ५४७ की मौत हो गयी…..(आंकड़े उत्तरप्रदेश स्वास्थ्य परिषद के वार्षिक रिपोर्ट से साभार) …
ये सारे आकंड़े सरकारी हैं…..अगर एनजीओ और अन्य प्राइवेट संगठनों के आकंड़ो को माना जाय तो १९७८ से अब तक पूर्वांचल के पचास हजार से ज्यादे मासूम इन्सेफेलाइटिस के सुरसामुख में समा चुके है…..साथ ही निजी अस्पतालों और घर में दम तोड़ देने वाले बच्चों की संख्या भी इसमें नहीं जोड़ी गयी है…..ऐसे हाल में राजनीतिक का शिकार हो चुकी इस बीमारी के शिकंजे से पूर्वांचल कब तक मुक्त हो पायेगा …इसका कोई ठिकाना नहीं है…..
यह आईना है स्वाइन फ्लू-और बर्ड फ्लू जैसी आयातित बीमारियों को हौवा बना कर लाखों करोड़ो रुपयों के बजट को डकारने वाली संस्थाओं के लिए…..या फिर सरकारी संस्थानों के लिए…..ठंडे प्रदेश से निकली स्वाइन फ्लू की बीमारी को जिस तरह देश के सभी प्रमुख सम्मानित न्यूज चैनलों और अखबारों ने प्रमुखता से उठाया उससे तो यही लगा कि देश में महामारी आ गयी है….और अब कोई भी नहीं बचने वाला….फटाफट करोड़ो के फंड पास हुए …दिल्ली के प्रतिष्ठित राममनोहर लोहिया अस्पताल में तो इसके लिए एक विशेष वार्ड तक बना दिया गया….और आपातकालीन चिकित्सा की हर स्तर पर व्यापक व्यवस्था की गयी….लेकिन अफसोस कि तीन दशक से भी ज्यादे समय से अपने लालों को खोने वाले पूर्वांचल के इस दैत्य के सर्वनाश के लिए एक धेला भी नहीं दिया गया…..उलटे २००५ में मेडिकल कौंसिल आफ इण्डिया ने इस इलाके के एकमात्र मेडिकल कालेज की पीजी मान्यता निरस्त करने का सुझाव दिया बजाय इसके कि उसे और भी अधिक अत्याधुनिक बनाया जाय…..सवाल ये नहीं है कि स्वाईन फ्लू का इतना हौव्वा क्यों खड़ा किया गया …बल्कि सवाल ये हैं कि हजारों मासूम जानों की बलि के बाद भी पूर्वांचल के प्रति सरकार इतनी बेरहम क्यों है…..क्या कांग्रेस क्या भाजपा क्या सपा और अब बसपा….सिवाय आश्वासनों के इस इलाके को कुछ नहीं मिला……देश को चार केन्द्रीय मन्त्री, एकप्रधानमन्त्री, और प्रदेश स्तर पर दर्जनों मन्त्री देने वाले इस इलाके की पीड़ा से अभी भी केन्द्र से लेके राज्य सरकार तक अन्जान है……या फिर यूं कहें कि आँखे मूंद कर उन मांओं की पीड़ा नहीं सुनना चाहती….जिन्होने दिल के टुकड़े की लाश अपने हाथों से ढोयी है…….साथ ही धिक्कार है उन मीडिया वालों पर जो कि दिल्ली या फिर विकसित शहरो या इलाको में होने वाले कुत्ते की मौत पर भी ब्रेकिंग न्यूज चलाते है…मगर रोज-रोज गोरखपुर मेडिकल कालेज के नेहरु अस्पताल से निकलने वालें मासूमों की लाशों के लिए उनके चैनल का स्क्रॉल(टीवी स्क्रीन के नीचे चलने वाली पट्टी)तक नसीब नहीं हुआ……..शर्म……..शर्म…………शर्म……………

डॉ. योगेश पाण्डेय

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