Monthly Archives: December 2010

भष्ट कैसे बना श्रेष्ठ

खर्च करके ही इन्‍सान कमाना सीखता है, और इसके लिऐ मेहनत जरूरी हैं जो देश और समाज दोनो के लिऐ आवश्‍यक हैं सरकार का काम बुनियादी आवश्‍यकताओ को सुचारू व सुनिश्चित करना हैं वोट बैंक के नाम पर सरकारी लंगर चलाना मक्‍कारी को जन्‍म देता हैं, आज जिस वेतन पर पिता कार्यमुक्‍त हो रहा हैं बेटा उसी वेतन पर नौकरी की शुरूवात कर रहा हैं

Yogesh

 आप चाहे जो कहें। पर भष्ट होना आज की तारीख में श्रेष्ठ होने से कमतर नहीं है। श्रेष्ठ होने का पैमाना होता है मगर भष्ट होने का कोई पैमाना नहीं होता है। आप कैसे भी। कहीं भी। किधर भी। भष्ट हो सकते हैं। कहीं कोई रोकटोक नहीं। समाज में जितनी जल्दी पहचान भष्ट और भष्टाचार को मिलती है, उतनी श्रेष्ठ को नहीं। श्रेष्ठ हटबचकर, साफसफाई के साथ जिंदगी को जीते हैं। भष्ट बेपरवाह और बिंदास होकर जिंदगी का मज़ा लेते हैं। श्रेष्ठ जेल जाने से भय खाता है। भष्ट खुलकर जेल जाता है। श्रेष्ठ के पांव होते हैं। भष्ट के पांव नहीं होते।
 दैनिक जागरण के दीपक जोशी जी अपने ब्लॉग पर  लिखते है की
पढ़ाई शुरु होने से लेकर पढ़ाई खत्म होने तक ,जो भी गणित पढ़ाई गई थी, उसमें सिर्फ यही पढ़ा था कि “दो धन दो चार होता है।”
यह सिर्फ हमनें ही नहीं सभी ने पढ़ा होगा। लेकिन यह दो+दो=चार में “भष्ट” कब जुड़ा पता ही नहीं चला ।
कहते है कि बूंद बूंद से मटका भरता है ….और शायद उसी तरह से यह भष्टाचार धीरे-धीरे पूरे समाज में भर चुका है।।
आज हमारा समाज इस भष्टाटचार के दलदल में इतना धंस चुका है कि हर वर्ग का इन्सान काफी हद तक इसकी चपेट में आ चुका है।
“भष्टाचार”, मैं इस शब्द कि व्याख्या तो नहीं कर पाऊँगा, पर मुझे लगता है कि यह एक ऐसी बिमारी है, जो आज एक छोटे से चाय के ढाबेवाले से लेकर किसी बड़ी कम्पनी के अधिकारी तक को लग(सर) चुकी है। हम यह नहीं कहते कि आज का हर इन्सान भष्ट है लेकिन जाने अनजाने में ही सही, पर वो इस भष्टाचारी समाज का हिस्सा बन चुका है।
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योगेश पाण्डेय
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जूलियन असांजे



M.K.Pandey

Wiki leaks के संस्थापक व आस्ट्रेलिया के खोजी पत्रकार जूलियन असांजे ने सच्चाई सामने लाने के लिए जो दमखम दिखाया उसकी जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है पर उनका तरीका कैसा था इस पर मैं  कुछ  नहीं कहूगा।
2006 में असांजे ने विकीलीक्स की स्थापना की। जूलियन असांजे विकीलीक्स. कॉम के एडिटर इन चीफ और प्रवक्ता हैं। असांजे का मानना है कि उनकी पांच लोगों की टीम ने इतने अहम और गुप्त दस्तावेज जारी किए हैं, जितनी पूरी दुनिया की मीडिया में नहीं किए गए हैं।
1971 में जन्मे जूलियन असांजे 1980 के दशक के आखिर में हैकिंग करने वाले ग्रुप ‘इंटरनैशनल सबवर्सिव्स’ के सदस्य थे। इस ग्रुप को मेंडेक्स के नाम से भी जाना जाता था। इस दौरान 1991 में मेलबर्न में मौजूद असांजे के घर पर ऑस्ट्रेलियाई पुलिस ने छापेमारी भी की थी। १९९४ में असांजे ने कंप्यूटर प्रोग्रामर की हैसियत से काम करना शुरू किया। 1999 में असांजे ने लीक्स. ओआरजी नाम से एक डोमेन रजिस्टर्ड कराया था। लेकिन असांजे का कहना है तब उन्होंने इस डोमेन पर कोई काम नहीं किया था।
इन हालात में अगर जूलियन असांजे जैसा दमदार व्यक्ति सच्चाई की अलख जगाने के लिए विकीलीकस जैसी  की स्थपना कर दुनिया को सच्चाई के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है तो उसका हर तरफ से स्वागत  ही होना चाहिए था । @@@@@@@@@@@@@@@@@@
मधुलेश पाण्डेय “निल्को जी”

पेश है कुछ अंश..

VMW Team ने अलग-अलग लोगो से आरक्षण के बारे में जानने की कोशिश की पेश है कुछ अंश…





A.K.Pandey
राजस्थान के ए. के. पाण्डेय  कहते है की   दिक्कत की बात यह है कि इतने वर्षों तक प्रयोग चलाने के बाद आरक्षण हमारे समाज में सामाजिक न्याय का पर्याय बन गया है. कई मायनों में उसका विकल्प बन गया है. यह दुखद स्थिति है.
यह तो उस तरह है कि कोई सर्जन एक ही कैंची से हर तरह की सर्जरी करे.यदि आरक्षण देना ही है तो सबसे आर्थिक स्थिति का आकलन करके आरक्षणं दीजिए, वो भी एक लिमिटेड समय तक।उसके बाद आरक्षण बन्द।लेकिन बदकिस्मती से अपने देश मे ऐसा होता नही है,वोट की क्षुद्र राजनीति की वजह से नेता आरक्षण हटाते नही।

 



N.D.Dehati



 गोरखपुर के एन.डी.देहाती  कहते है की सरकार द्वारा उच्च शिक्षा में अन्य पिछड़ी जातियों के आरक्षण के विरोध का प्रभावित लोगों द्वारा लोगों विरोध किया जा रहा है। विरोध के कारणों में प्रतिभा की उपेक्षा, गुणवत्ता में गिरावट का डर तथा समाज को पिछड़ेपन के कुयें में ढकेल देने व विकास की गति में नकारात्मक प्रभाव आदि-इत्यादि बताये गये हैं।



यह सच है कि समाज में जब किसी भी वर्ग को मिलने वाली सुविधाओं से वंचित होना पड़ता है या किसी दूसरे वर्ग को ज्यादा सुविधायें मिलतीं हैं तो खलता है। बुरा लगता है। जाति पर आधारित आरक्षण से यह प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है। जो जातियाँ प्रभावित होती हैं उनकी सहज प्रतिक्रिया होती है कि पुरखों के पापों का दंड हम क्यों भरें?यह कहां का न्याय है कि हमसे कम सक्षम व्यक्ति सिर्फ इस आधार पर ज्यादा पाये कि अनुसूचित जाति-जनजाति का है या फिर पिछड़ी जाति का है।




Niraj

हरखौली, देवरिया  के नीरज जी कहते है की अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति में कोई क्रीमीलेयर वर्ग की श्रेणी न होने से किसी कलेक्‍टर, एसडीएम यानि वर्ग एक अधिकारी के पाल्‍य भी आरक्षण सुविधा का लुत्‍फ उठाते हैं। यह तो अन्‍याय है। आप ज्रबरन ही किसी को जम्‍प कराकर किसी संवैधानिक पद पर बिठाऍंगे तो क्‍या वास्‍तविक तरक्‍की मिल पाना संभव है ? बौद्धिक विकास एक सतत् प्रक्रिया का फल है, यदि विकास कराना ही है तो बौद्धिक विकास हो, ऐसा प्रयास करें। अंत में यही कहना चाहूँगा, आरक्षण से विकास तो कतई नहीं हो सकता।


Dr.H.M.Pandey  
हिमांचल प्रदेश के Dr.H.M.Pandey  कहते है की आरक्षण तो देश के सामने की तमाम समस्याओं में से एक है। एक तरह से भ्रष्टाचार,बेरोजगारी,अशिक्षा,बेईमानी का बाईप्रोडक्ट है। जब तक ये समस्यायें रहेंगी इस तरह की समस्यायें बनीं रहेंगी। जब तक प्रयासों में ईमानदारी नहीं होगी किसी भी समस्या का हल जीरो बटा सन्नाटा ही होगा तथा नित नयी समस्यायें सामने  आती रहेंगी। हर समस्या के लिये नेताओं को दोष देने की हमारी प्रवृत्ति है।नेता तो हमारे समाज के प्रतिनिधि हैं। जैसे हम होंगे वैसे हमारे रहनुमा होंगे। नेता कहीं आसमान से तो नहीं आयेंगे।हमारे बीच से ही आयेंगे। बकौल मेराज फैजाबादी नेताओं का तो काम ही है-
पहले पागल भीड़ में शोला बयानी बेचना
फिर जलते हुये शहरों में पानी बेंचना ।

 

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एक नई चीज

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इस आरक्षण ने..

 रविन्द्र नाथ यादव 

देश की किसी भी राजनीतक पार्टी के किसी भी नेता को आरक्षण के बारे बोलने पर उसकी जुबान को लकवा मर जाता है  उसे सिर्फ अपने राजनीतक भविष की चिंता है  पर देश की चिता नहीं  इस के लिए इन पर कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए  ६० सालों में देश का सत्य नाश के के रख दिया
है इस आरक्षण ने..

सबसे ज्‍यादा चर्चित एवं विवादास्‍पद विषय आरक्षण पर समग्रता से नजर डालने की जररत हें मेरी नजर में यह ऐसी दवा बन गयी हे जिसकी इजाद इसलिए की गयी थी ताकि समाज में वचितं एवं दलित पिछडो को विकास की मुख्‍य धारा से जोडकर उनकी स्थिति में सुधार लाया जा सके ।इसे आप सामाजिक क्रांत‍ि एंव सामाजिक बदलाव का माध्‍यम कर सकते है। लेकिन इस समय आरक्षण राजनैतिक रेवडी हो गयी है,ज‍िसे हर नेता अपने वोट बैंक के खाते में डालना चाहता है।
स्वतंत्र भारत में आरक्षण की शुरुआत दलित समाज को अन्य समाज के बराबर खडा करने के उद्देश्य से की गई थी। समय गुजरने के साथ-साथ दलित, आरक्षण तथा आरक्षण की आवश्यकताओं आदि की परिभाषा भी बदलती गई। यदि कुछ लोगों ने विशेषकर आरक्षित वर्ग के सम्पन्न लोगों ने इस आरक्षण नीति के लाभ उठाए हैं तो इसी आरक्षण के विद्वेष स्वरूप हमारा यह शांतिप्रिय देश कई बार आग की लपटों में भी घिर चुका है। मण्डल आयोग की सिफारिशों को लागू किए जाने को लेकर पूरे देश में छात्रों द्वारा अपने भविष्य के प्रति चिंतित होकर जो आक्रोश व्यक्त किया गया था तथा उस दौरान जिस प्रकार की दर्दनाक घटनाएं सुनने में आई थीं, उन्हें याद कर आज भी दिल दहल जाता है। परन्तु आम जनता सिवाए मूकदर्शक बनी रहने के और कर भी क्या सकती है।
मेरे स्कूल  S.N.Public School, Beharadabar, Bhatani, Doeria के एक बच्चे (बारूद यादव) ने कहा – समाजवाद से जो रह गया, वह रहा सहा बंटाधार आरक्षण पूरा कर देगा.
सेना और निजी क्षेत्र में आरक्षण का सोच कर ही रूह काँप जाती हैं.
हे भगवान! इस देश ने तुम्हारा क्या बिगाङा हैं, इन नेताओं को अपने पास बुला ले….

प्रिंसिपल आशा ओझा जी ने कहा – भारत में रहना अब और भी चैलेंचिंग होने वाला है ।
सरकार अब शिक्षण संस्थाओं में 50 प्रतिशत आरक्षण करने वाली है । तो अब हमारे बच्चे जो जी तोड मेहनत कर रहे हैं, मूर्ख हैं । क्योंकि कोई उससे कम योग्य होते हुए भी जाति के आधार पर प्रवेश पा लेगा । क्या ये करने से देश व समाज का भला होगा ? या जातिवाद, घूसघोरी को बढावा मिलेगा।
यह कदम सिस्टम को मजबूत करेगा या उसे और कमजोर करेगा ?
मेरा मानना है कि जिनके पास साधन नहीं है पर प्रतिभा है, उन्हें साधन प्रदान किए जाने चाहिए, चाहे वो किसी भी जाति के हों । पर परीक्षा में चयन सिर्फ योग्यता पर होना चाहिए ।
मतलब सरकार व समाज पढाई के लिए जो हो सकता है करे, ट्यूशन फीस माफ करे, किताबों का इन्तजाम करे, कोचिंग की व्यवस्था करे और एक ऐसा सहयोग दे कि साधनाभाव का एहसास न हो।
        के.के. ओझा जी कहते है की – निजीकरण ने मंडल के प्रभाव को बहुत कम कर दिया है। लेकिन आर्श्‍चय यह है कि इतने बडे एवं प्रभ‍ावित करने वाले विषय से मीडिया, एवं विधायिका ने अपना मुंह मोड लिया। इस पर तार्किकता की कोइ गुजांइस बाकी नहीं छोडी। इसी कारण आरक्षण अब बैमनस्‍य का जहर बन गया है

समाज सेवक श्री जनार्दन जी कहते है की – आरक्षण का आधार आर्थिक होना चाहिये। चाहे किसी भी जाति का हो परंतु निर्धन को आरक्षण मिलना चाहिये।
पूर्व ग्राम प्रधान श्री नेबुलाल  यादव कहते है की आरक्षण का लाभ अभी तक कुछ जातियों तक ही क्‍यों सीमित है। O.B.C. में यादव,कुर्मी जाट,गुर्जरों ने ही फायदा लिया है। इसी प्रकार S.C.S.T. का फायदा जाटव व मीणाओं को ही ज्‍यादा मिला है। क्‍यों यह सामाजिक बदलाव की हवा अन्‍यों तक नहीं पहुचीं है।

 रविन्द्र नाथ यादव 
वशिष्ट   अध्यापक
S.N.Public School,
Beharadabar, Bhatani

What is Dream by T.K.Ojha,VMW Team

What is Dream
Dream is a thing, by which a person can fly without any wing.
Dream is a test, in which everyone thinks, that he is the best.
Dream is a rope, by which a person can fill a sense of new hope.
Dream is a star, by which a person can make life, like a star.
Tripurendra Ojha
S.N.Public School
VMW Team, Bhatni
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