गिरती नैतिकता संवरे कब

ओ दिव्य अलौकिक मनुज समाज
सुनो अपनी अंर्तमन की आवाज।
घूम रहे कुटिल विचार के पंख जब
गिरती नैतिकता संवरे कब।।

ओ पाश्चात्य संस्कृति में झूल रहा
मनुज अपना आचरण भूल रहा।
खोले मूल नैतिक वस्त्र जब
गिरती नैतिकता संवरे कब ।।

हमने समझी जिंदगी चल रही
देखी स्वार्थ से दुनियां फल रही
हो गए एक दूजे के मेहमान जब
गिरती नैतिकता संवरे कब।।

हाय ,हेल्लो का अब जमाना
भृष्टाचारी से पैसा कमाना
अपनत्व का भाव नही जब
गिरती नैतिकता संवरे कब ।।

सोशल मीडिया पढ़ाता पाठ
स्टेटज दिखाता अपनी ठाठ।
न मिलते हम अपनों से जब
गिरती नैतिकता संवरे कब ।।

न यहाँ नारी को सम्मान मिला
न सीता जी को वरदान मिला
हैवानियत में द्रोपदी लुटी जब

गिरती नैतिकता संवरे कब।।

सिगरेट ,नशा पीते शान समझते
दिखावेपन में जान समझते
बुढापे में बालो की ढाई जब,
गिरती नैतिकता संवरे कब ।।

न पढ़ते लोग रामायण ,गीता
बनके रावण लुटती सीता।
नई सदी में आये संस्कार जब
गिरती नैतिकता संवरे तब।।

प्रवीण शर्मा ताल

राम राज्य के सपने टूटे

त्याग तपस्या की भूमि पर
पाप बीज के अंकुर फूटे
बहुत संजोया बहुत सम्हाला
राम राज्य के सपने टूटे ।

आजादी का मूर्त रुप
सपनों मे नित आता है
बलिदानों की गाथा गाकर
बहता रक्त दिखाता है
उभरे ललाट पर शुभ्र रेख
स्वाभिमान का द्योतक है
चलो चलो भारत छोड़ो
इस पंक्ति का उद्घघोषक है
हुई तिरोहित मधुर कल्पना
जब अपने अपनों को लूटे
त्याग तपस्या की भूमि पर
पाप बीज के अंकुर फूटे
बहुत संजोया बहुत सम्हाला
राम राज्य के सपने टूटे ।

बहुत क्षोभ है जन जीवन में
हतप्रभ लोग गिरावट से
सीधे पन की हार सहज ही
झूठों और बनावट से
नैतिकता को निर्वासित कर
मूल्य हीन जीवन का पोषण
श्वेत दृष्टि मय कालिख भीतर
हैं भयहीन करें जो शोषण
जिस पथ पर हम चले जा रहे
जाने वह पथ कैसे छूटे
त्याग तपस्या की भूमि पर
पाप बीज के अंकुर फूटे
बहुत संजोया बहुत सम्हाला
राम राज्य के सपने टूटे ।

विजय कल्याणी तिवारी
बिलासपुर छग

हाँ कविता बोलती है

हाँ कविता बोलती है, हाँ कविता बोलती है,
मन की सारी वेदनाएं और खुशियां खोलती है।
हाँ कविता बोलती है, हाँ कविता बोलती है

एक यौवन हो सवेरा या वो ढलती शाम हो,
या बसन्ती रूप हो या पतझरों का याम हो।
सूख चुके फूल में भी खुश्बुओं को घोलती है।
हाँ कविता बोलती है, हाँ कविता बोलती है

बाहरी सब आहटों को है परखती आग में,
स्वप्न हो या हो हकीकत गा उठे हर राग में।
शब्द के लेकर तराजू भाव उसमें तोलती है,
हाँ कविता बोलती है, हाँ कविता बोलती है

ज़िन्दगी रिश्ते निभाती है स्वयं को तोड़कर,
हाँ नदी सिंधु में जाती पत्थरों को मोड़कर।
प्रीत की मधुशाल में वो बिन पिये ही डोलती है,
हाँ कविता बोलती है, हाँ कविता बोलती है

नरेंद्रपाल जैन

डॉ प्रियंका रेड्डी – कब तक सत्ता मौन रहेगी

कब तक सत्ता मौन रहेगी,
कब तक प्रसासन के हाथ बंधे रहेंगे
क्या बलात्कार करके आरोपी
जेल में सिर्फ मुँह छिपाने जाएंगे

अब तो थोड़ी शर्म करे प्रशाशन
और कोई सजा ऐसे सुनाए
अगर कोई बलात्कारी को बचाये
उसे भी सजा- ए- मौत दी जाए

जनता के बीच सभी आरोपियों को
बीच चौराहे पर लटकाए
मौत की भीख वो मांगते रहे
मारो इतने जब तक मर ना पाएं

जो ऐसा बिल पास न कर सके
ऐसा शासन किसी भी काम का नही
जो स्त्रयो का सम्मान न कर सके
ऐसा प्रशासन किसी नाम का नही

सौरभ जैन(उज्ज्वल)

वो नजदीक मेरे आने लगे हैं

दूरियां इस कदर मिटाने लगे हैं
वो नजदीक मेरे आने लगे हैं

बन्द आँखों से भी नजर आते हैं
इस कदर दिल मे समाने लगे हैं

रूठ सकते नहीं एक पल के लिए
रूठ जाऊं तो फिर मनाने लगे हैं

रंगीनियां और मस्ती का आलम
ख्वाब आँखों में सजाने लगे हैं

मेरे अपने हुए, नहीं वो अजनबी
हाले दिल अपना बताने लगे हैं

जिंदगी भी तो मेरी मुस्कुराने लगी
अपनापन जबसे जताने लगे हैं

-किशोर छिपेश्वर”सागर”

हिन्दी कविता-आबरू लूटने लगे

अब सरे राह नारी नर भक्षी घूमने लगे |
अकेली अबला आबरू निर्भय लूटने लगे |
सुना था जंगलो मे जानवर हिंसक रहते है |
लूट आबरूअबला बोटियाँ काटने लगे |
राह अकेली औरत बचाने कोई आता नहीं |
मर्द मर्दानीगिनी दिखाने कोई आता नहीं |
जब बहू बेटियाँ समाज मे सुरक्षित नहीं |
पड़ जाये मुसीबत नारियां रक्षित नहीं |
देख दुर्दसा माँ बहनो छाती फटने लगे |
राजनीति कुर्सी हथियाने हथियार हो गई |
तोल मोल खरीद फ़रोक्त ब्यापार हो गई |
कहा सो गए नारिया बिच राह कटने लगे |
कितना दर्दनाक शर्मनाक मंजर रहा होगा |
लूटती तड़पती प्रियंका दिल सिहर रहा होगा |
अब भगवान भरोसे जानो अस्मत बचने लगे |

श्याम कुँवर भारती

पूछते हो कि मैं खुश हूँ

दिनोंदिन दल बदलते हो पूछते हो कि मैं खुश हूँ,
पासा पल में पलटते हो पूछते हो कि मैं खुश हूँ !

अनुशासन या डर कहो है बहुत जरुरी घर-बाहर,
अधनंगे खुद निकलते हो पूछते हो कि मैं खुश हूँ !

पहले तुमने देश भीतर जड़-तने खंडित किये,
विघटन की चालें चलते हो पूछते हो कि मैं खुश हूँ !

आजादी के मायने अफजल कन्हैया क्या समझें,
अफसोस तुम पक्ष रखते हो पूछते हो कि मैं खुश हूँ !

मन कहे, खुशियाँ बाँटूं सो कह चला, हूँ खुश बड़ा,
अस्मिता को लूटते हो पूछते हो कि मैं खुश हूँ !

~ अमर अद्वितीय मथुरा

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